शुक्रवार, 02 जून, 2006 को 07:27 GMT तक के समाचार
(बिंदास बाबू की डायरी)
गाँधी जी को फासिस्ट गोडसे ने मार डाला और उनके तीन बंदरों को अगवा कर लिया.
गोडसे भाई ने उनमें अपना बजरंगी भाव का जीन रोप दिया. उनका नया संस्कार हो गया.
वे हर तरफ बुरा देखते. ख़ूब बुरा सुनते और उससे भी बुरा कहते-करते. जनतंत्र की शर्म के ऊपर पोस्टर लगाकर रखते, 'बुरा मत देखो', 'बुरा मत सुनो', 'बुरा मत कहो'.
नियम बना दिए गए. विद्यार्थियों को जला डालो. लूट लो. चुपके से कब्रें बना दो. जो अपना धर्मी हो लेकिन कुधर्मी हो गया हो, उसे भी ठोक लो. उसके उपर पाबंदी लगा दो. धमका दो और उसकी कोई भी बात न चलने दो.
समय गुज़रा. इस दौरान गोडसे ने अपने को 'गॉड' समझना शुरू कर दिया.
इससे उसकी नाक बहुत ही लंबी होने लगी. वो इस आर्यावर्त में फैल गई. इतनी लंबी हो गई कि कोई नाप नहीं सका.
लंबी नाक को अपने ज़रा से भी विरोध की ख़ुशबू दूर से आ जाती. गोडसे की लंबी नाक तुरंत पाबंदी लगा देती.
धीरे-धीरे गॉड जैसे गोडसे ने गाँधी जी के सहनशील इलाके को असहनशील और ज्वलनशील इलाके में बदल दिया. इस तरह एक नए फासीवादी मुल्क का जन्म हुआ.
'सामाजिक इंजीनियरिंग' होने लगी. अल्पसंख्यकों को आग में जिंदा झोंक दिया जाता था. उनकी दुकानें लूट ली जाती थी. कोई कुछ नहीं बोल पाता था.
सेंसरशिप, धमकी, पोस्टर फाड़ो जैसी प्रतियोगिता आए दिन आयोजित होने लगीं.
आख़िर नाक की जो बात ठहरी.
इन दिनों भी अभ्यास चल रहा है. कभी-कभी उसके नियम-कायदे-क़ानून प्रकट हो जाते हैं.
जब प्रकट होते हैं तो लगता है कि यह तो कुछ अलग-सी बातें हो रही हैं. जो पूरे मुल्क में नहीं होता वह वहाँ होता है. इसीलिए कुछ पागल लोग गाँधी के मुल्क को एक अलग-सा इलाका मानते हैं.
नाक के संदर्भ में लेटेस्ट घटना इस तरह हुई.
एक दिन कुछ लोग बाँध से उजड़े लोगों को रोटी पानी देने की माँग करने लगे. नाक ने पाबंदी लगा दी.
फिर एक दिन जिसकी अक्ल पर पत्थर पड़े, वो हीरो आमिर ख़ान निकला. उसने आकर उजड़े-बिखरे बेसहारा लोगों के आँसू पोंछने की बात कह दी.
बस उस पर गोडसे की नाक घायल हो गई. सारे बजरंगी आमिर पर पिल पड़े. उसकी फ़िल्म 'रंग दे बसंती' बंद कर दी गई.
नई फ़िल्म 'फ़ना' को सिनेमा हॉलों में लगने नहीं दिया गया. अपराध था आमिर ने भाई जी के बाँध बराबर ऊँचे हिटलरी इतिहास में और अब तक की महानतम नाक के हुजूर में ग़ुस्ताखी की थी.
मगर युवा लोग आमिर के दीवाने थे. वे उस नाक वाले मुल्क को छोड़ मुंबई जाकर 'फ़ना' को देखने और हिट करने लगे.
देखते ही देखते पूरे मुल्क में आमिर हिट हो गया.
'फना' ने रिकॉर्ड कलेक्शन किया. नाक देखती रह गई.
नाक ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी. अपने बजरंगियों को हुक्म दिया कि आमिर के विज्ञापनों पर पाबंदी लगा दो. पाबंदी लगा दी गई.
लेकिन ये क्या कि टीवी पर पाँच-पाँच विज्ञापन आमिर के आने लगे. दीवारों पर पोस्टर फाड़े जा सकते थे. होर्डिग फाड़ी जा सकती थी लेकिन टीवी चैनलों का क्या करते?
वहाँ आमिर खान लगातार दिखता. फ़िल्म से भी ज़्यादा दिखता. कभी कार बेचता. कभी घड़ी बेचता. कभी 'फना' के प्रोमो करता.
मित्रों अब कटी नाक के सामने सवाल ये है कि नाक इस हालत से कैसे निपटे?
महान कटी नाक की यह त्रासदी सबके लिए सबक देने वाली है. यदि फिर भी कोई बजरंगी इस सवाल का जवाब देगा तो उसे हिंदुत्वरत्न की उपाधि मिल सकती है.
है इस आर्यावर्त में कोई माई का लाल.
(बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर)