मंगलवार, 23 मई, 2006 को 23:35 GMT तक के समाचार
गीता पांडे
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से लौटकर
पिछले महीने भारत प्रशासित कश्मीर में महिलाओं के लिए एक ख़ास पत्रिका 'शी' शुरू की गई. 'शी' राज्य की पहली महिला पत्रिका है.
कश्मीर के लोगों में इसे देखने की काफ़ी उत्सुकता थी मगर जब वे इसे ख़रीदने बाज़ार गए तो उनके हाथ सिर्फ़ निराशा ही लगी.
'शी' की प्रतियाँ इसके प्रकाशक और संपादकों ने मुफ़्त में बाँट दी थीं.
इसके बावजूद भी 'शी' के बारे में लोग बोलने से थकते नहीं है और इस लोकप्रियता के दो कारण हैं.
पहला तो यह कि 'शी' की दो संपादकों में से एक हैं शीबा मसूदी, जो हुर्रियत कांफ़्रैंस के अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ की पत्नी हैं.
और दूसरा कारण है 'शी' के पहले अंक में 'डेटिंग' पर छपा एक लेख.
चर्चा में
श्रीनगर स्थित ख़ान न्यूज एजेंसी के मालिक हिलाल अहमद बताते हैं कि उनकी दुकान में अब तक क़रीब दो सौ लोग इस पत्रिका के बारे में पूछने आ चुके हैं.
वो बताते हैं, "इस पत्रिका के बारे में अख़बारों में काफ़ी कुछ लिखा गया था और चूँकि इसका मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ के परिवार से भी रिश्ता है, इसलिए पत्रिका के बारे में लोगों में काफ़ी उत्सुकता है."
हालांकि शीबा मसूदी 'शी' को जबरन मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ के नाम से जोड़ने से खुश नहीं हैं और शायद यही कारण है कि वो इस पत्रिका के बारे में किसी से भी मिलने या बात करने से इनकार कर देती हैं.
मुझे भी उन्होंने फ़ोन पर 'शी' की दूसरी संपादक सायमा फ़रहाद से बात करने की हिदायत दी.
सायमा कहती हैं उनकी समझ में नहीं आता कि लोग इस पत्रिका के साथ मीरवाइज़ का नाम जोड़ने की कोशिश क्यों करते हैं.
सायमा कहती हैं, "एक औरत को हमेशा किसी की पत्नी, बेटी या बहन मानकर ही क्यों देखा जाता है? वह कभी अपनी इच्छा से भी कुछ कर सकती है. शीबा(मीरवाइज़ की पत्नी) अपने आप भी तो कुछ शुरू कर सकती हैं."
बात निकलेगी तो...
हालांकि यह पत्रिका कम लोगों ने पढ़ी है मगर इसके बारे में बात करने में लोग कतई नहीं हिचकिचाते.
मुस्लिम जान, कश्मीर विश्वविद्यालय के मीडिया शिक्षा विभाग में संपादक हैं और उन चंद लोगों में से हैं जिन्होंने ये पत्रिका पढ़ी है. उनका मानना है कि 'शी' एक अच्छी शुरूआत है.
जान मानते हैं कि इससे कश्मीर की महिलाओं को उनसे जुड़े हुए मुद्दों पर बातचीत करने के लिए एक राह मिलेगी.
इस पत्रिका में कामकाजी महिलाओं की समस्याओं और स्तन कैंसर जैसे विषय भी उठाए गए हैं. मगर सबसे ज़्यादा ध्यान केंद्रित रहा है 'डेटिंग' पर लिखे गए एक लेख पर.
इस लेख में एक छात्रा कहती हैं, "ब्वायफ़्रैंड होना एक फ़ैशन की बात है. मेरी सारी सहेलियों के ब्वायफ़्रैंड हैं."
एक अन्य छात्र के मुताबिक़ लड़के-लड़कियाँ ज़्यादातर इंटरनेट कैफ़े में मिलते हैं.
इस छात्र ने बताया, "इंटरनेट कैफ़े में बूथ होते हैं जिनमें हम लोग आराम से मिल सकते हैं और जब तक हम हर घंटे के 20 रूपए देते रहें, किसी को कोई परेशानी नहीं होती."
ज़ाहिर है कि इस तरह के खुलासे कश्मीर के लोगों को पसंद नहीं आए हैं. कश्मीर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं की इस बारे में मिली-जुली प्रतिक्रिया रही.
प्रतिक्रियाएं
मीर ज़बीन, जो लाइब्रेरी विज्ञान में एमए कर रही हैं, कहती हैं कि हालाँकि डेटिंग इस्लाम धर्म में वर्जित है फिर भी इस विषय पर यह लेख लिखना सही है.
मगर उनके साथ पढ़ रहे बिलाल अहमद मानते हैं कि डेटिंग एक व्यक्तिगत मामला है.
बिलाल कहते हैं, "मैं यह मानता हूँ कि कश्मीर में डेटिंग ज़रूर शुरू हुई है मगर ये इतनी गहरी समस्या नहीं है कि इसके ऊपर पत्रिकाओं में लेख लिखे जाएँ."
जानिसार कुरैशी खुश हैं कि कश्मीर में अब महिलाओं के लिए एक पत्रिका शुरू हुई है, मगर वह चाहती हैं कि इसमें धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर भी लेख छापे जाएँ.
फ़हीम असलम कहते हैं कि उन्हें इस बात से कोई परेशानी नहीं कि ये पत्रिका डेटिंग जैसे विषयों पर लेख छापे.
पत्रिका की संपादक सायमा फ़रहाद कहती हैं, "सब जानते हैं कि कश्मीर में लोग डेटिंग पर जाते हैं मगर इसके बारे में लोग खुलेआम बात करने से कतराते हैं. मैं सोचती हूँ कि अगर लोग इस विषय पर बात नहीं करेंगे तो इस समस्या का समाधान कैसे होगा?"
एक छात्रा से बातचीत के दौरान मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या उसका भी कोई ब्वायफ़्रैंड है? मेरा सवाल सुन वह शर्म से लाल हो गई और जवाब मिला, "यह मेरा व्यक्तिगत मामला है."