मंगलवार, 18 अप्रैल, 2006 को 04:44 GMT तक के समाचार
(बिंदास बाबू की डायरी)
हमारी नज़र का ही खोट है कि इन दिनों नेकी करने वाला हर बंदा बदी करने वाला नज़र आता है.
भाई आमिर खान एक दिन आए. जंतर मंतर पर नर्मदा बचाओ वाले ग़रीब गुरबों के संग बैठे. बात की. तब से कैमरे उनके ही हो लिए. वो संघर्ष के हो लिए.
बिज़ी आदमी हैं. लगान, मंगल पांडे और रंग दे बसंती की कमाई बटोरने से फुरसत न पा सके. क्या करें. बहुत देर से मगर ज्यों ही पता चला कि नर्मदा वाले धूपताप से मर रहे हैं तो रहा न गया.
अरे अपने भक्तों की करुण पुकार पर भगवान विष्णु तो क्षीर सागर से बिना जूतों के ही दौड़ पड़ते थे तो क्या कलयुग में ख़बर पाकर कैमरों को एक वक्तव्य देने के लिए आमिर नहीं आ सकते थे ?
इसके बाद तो नर्मदा आंदोलन पीछे छूट गया. आमिर आंदोलन आगे आ गया.
मोदी छाप लोगंने गुजरात में रंग दे बसंती बंद करा दी. कोई बात नहीं. उन्हें ख़बरिया चैनलों पर नई ख़बरिया फ़िल्म जो मिल गई. नर्मदा न्यूज़ नायक नाम की फ़िल्म.
न्यूज़ एंकर उठ बैठे और मोदी छाप तोड़ फोड़ करने वालों के बारे में बताते रहे कि देखिए ऐसे लोग यही कर सकते हैं.
मीडिया और मोदी छाप कार्यकर्ता
लोगों ने पहली बार जाना कि ऐसा हो रहा है. वो रिस्क लेते दिखे. एकदम रंग दे बसंती वाला मूड. एकदम हिट.
लेकिन भगवान जी ने इस कहानी में ज़रा जल्दी ही ब्रेक लगा दिए. सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि यदि पुनर्वास का काम तीन महीने में पूरा नहीं हो जाता तो बांध का काम रोका जा सकता है.
इस बीच प्रधानमंत्री भी अपनी आदत के अनुसार कुछ मिनमिनाए. मामला सब तरफ़ से पॉलिटिकली करेक्ट हो गया.
मीडिया नर्मदा जनता के पास न पहुंचा. अपने सगे सहोदर चेहरे आमिर के पास पहुंचा. उन्होंने इत्मीनान से लंबी प्रेस कांफ्रेंस दी. दो दिन में ही वो सुप्रीम कोर्ट के जजों, सरकारों और नर्मदा वालों के प्रवक्ता बन बैठे.
उनके पास हर एक के लिए एजेंडा था. मेधा को भूख हड़ताल ख़त्म कर देनी चाहिए. जनता और मीडिया को तीन महीने तक सरकरों के पुनर्वास कार्यक्रम पर नज़र रखनी चाहिए. तीन महीने बाद आगे की बात हो.
प्रधानमंत्री और कोर्ट का धन्यवाद कि ऐसा फ़ैसला किया गया.
अंधा पीसे कुत्ता खाय
सारी लाइमलाइट आमिर ले गए. नर्मदा वाले किनारे हो गए. इसे कहते हैं एजेंडे की हाईजैकिंग. बड़े ताक़तवर लोग सेलेब्रिटी इस काम में माहिर होते हैं.
कहावत है अंधी पीसे कुत्ता खाय. अंधी जनता पिसाई करती है कुत्ता लोग खाते रहते हैं. अंधी जनता की यही नियति है.
सेलिब्रिटी आएगा तो सबसे पहले खुद को सेल करेगा. मार्केट करेगा. जनकल्याण की थीम तो सबसे ज़्यादा मार्केट होती है.
बहुत से लोग भावुक होकर सोचने लगते हैं कि देखो कितना बड़ा आदमी हमारे बीच आया. कमाल है लेकिन इतना याद रखना चाहिए कि जाके पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई.
नर्मदा वालों के साथ पहले भी ऐसा हो चुका है कि कई सेलिब्रिटी उनके एजेंडे की हाईजैकिंग करने की जुगत लगा चुके हैं लेकिन सफल नहीं हुए.
बस एकाध दिन की खूशबू ले देकर फ़ारिग हो गए हैं.
फ्लाई बाय नाइट मार्का वाले लोग इसी तरह आते जाते हैं. आमिर भईया जो जीता वही सिकंदर के हीरो रहे हैं. सिकंदर आंधी की तरह आया था और तूफान की तरहगया.
अगर वाकई कुछ करना चाहते हैं तो सब ताम झाम छोड़कर नर्मदा वाले जैसे हो जाओ तब यकीन मानेंगे कि आमिर हवाहवाई मार्का सिकंदर नहीं हैं. हमारे आपके जैसा आम आदमी है.
(बिंदास बाबू की डायरी का ये पन्ना आपको कैसा लगा, इस बारे में hindi.letters@bbc.co.uk पर अपनी राय भेजें.)