बुधवार, 08 मार्च, 2006 को 08:30 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
दिल्ली से
हुमांयू के मक़बरे पर सूफ़ी संगीत, दुनिया के तमाम देशों से सूफ़ियों का कलाम गाने पहुँचे कलाकार और गूँजती तानों पर झूमते श्रोता.
कुछ ऐसी ही रूमानियत से लोगों को रूबरू कराते हुए दिल्ली में 'जहान-ए-ख़ुसरो' का आयोजन समाप्त हुआ.
दिल्ली में इस अंतरराष्ट्रीय सूफ़ी संगीत समारोह का यह छठा आयोजन था.
दिल्ली में तीन दिनों तक चला यह समारोह तालियों की गड़गड़ाहट और वाह-वाह के बीच सोमवार को देर रात समाप्त हुआ.
समारोह में भारत के अलावा पाकिस्तान, ईरान, जर्मनी और उज़बेकिस्तान के सूफ़ी गायकों ने हिस्सा लिया.
धुन
समारोह में सबसे ज़्यादा पसंद की गई पाकिस्तान की बेगम आबिदा परवीन की ख़ुद को भुला देने वाली आवाज़. साथ ही ईरान से आए रूमी ग्रुप का प्रस्तुतिकरण भी अपनेआप में अलग था और उसे भी बहुत सराहा गया.
बाहू से बुल्ले शाह तक और कबीर से अमीर ख़ुसरो तक, सूफ़ी संगीत का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला.
कानों में सुर गूँजे, 'मैं सूफ़ी हूँ सरबस्ता, मेरा कौन पिछाड़े रस्ता' और 'जिनको कछु न चाहिए, वो ही शाहंशाह'.
गाने के बाद आबिदा ने बीबीसी को बताया, "हम तो ज़रिया हैं, सब उसका करम है. हमारे पास तो कुछ नहीं है. जब वह अलाव जलाते हैं तो सब पर उसका असर होता है. ऐसा नहीं है कि इसकी अनुभूति केवल सुनने वाले को ही हो, सुनने वाले को न हो."
समारोह के आयोजक मुजफ़्फ़र अली कहते हैं, "जिसने भी यह कलाम सुना, वह शाहंशाह हो गया है. लोग यहाँ आकर ख़ुद को भूल जाते हैं और एक नई दुनिया में पहुँच जाते हैं."
समारोह में इस बार एक नया प्रयोग किया गया और वह था नए कलाकारों को सूफ़ी संगीत गाने का मौका देना. इस बार समारोह में दलेर मेहंदी, सुखविंदर सिंह जैसे पंजाबी गायक भी शामिल हुए.
सरोद वादक अमजद अली ख़ान के बेटों, अमान और अयान ने भी अपना हुनर पेश किया पर भारत से ज़्यादा सराहना मिली मालाबारियन ग्रुप की संगीतमय प्रस्तुति को.
किसकी चुनरी रंग दी?
निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह, ग़ालिब और अमीर खुसरो की मज़ारों से गुजरते हुए अरब की सराय में स्थित हुमांयू के मक़बरे पर इस समारोह का आयोजन किया गया था.
सुलगते लोबान और अगरबत्तियों की ख़ुश्बू माहौल को और भी खुशुनुमा बना रही थी पर इस रूमानियत को लेकर कुछ सवाल भी थे.
मसलन, समारोह में जहाँ देश के तमाम जाने-माने नौकरशाह, उद्योगपति, अख़बारों के पेज-3 पर छपने वाले चेहरे और प्रतिष्ठित लोग इस संगीत का आनंद ले रहे थे, वहीं आसपास और बाकी दिल्ली के लोग इससे वंचित ही थे.
वजह थी, समारोह में पहुँचने के लिए रखे गए टिकट. सैकड़ों के बिक रहे ये टिकट आम लोगों की जेब से बाहर की चीज़ थे.
इस बारे में पूछने पर मुजफ़्फ़र अली कहते हैं, "समारोह का आयोजन आसान काम नहीं है. इससे लोगों की तादाद भी सीमित रहती है और माहौल भी नहीं बिगड़ता है."
हुमांयू का मक़बरा भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में है. ऐसे में वहाँ ऐसे समारोहों का आयोजन पुरातत्व विभाग की इजाज़त से ही होता है और वह भी इस शर्त पर कि आयोजक लोगों से समारोह में आने के लिए पैसा नहीं लेगा.
बताया जा रहा है कि इस समारोह में टिकट लगाने से पुरातत्व विभाग के अधिकारी नाराज़ है.
बहरहाल, 'जिसकी चुनरी रंग दी, धन-धन उनके भाग' जैसे सूफ़ी कलामों की धूम और गूँज कई दिनों दिल्ली में बनी रहेगी.
यह बात और है कि ऐसे 'धन-धन भाग' बड़े लोगों के हैं. उनके नहीं, जिनके बीच सूफ़ी पैदा हुए, जिनकी बात सूफ़ियों ने अपने कलामों में कही हैं.