शुक्रवार, 24 फ़रवरी, 2006 को 16:46 GMT तक के समाचार
भारत के एक दम्पति ने राजधानी दिल्ली की सड़कों पर जहां-तहां फैले प्लास्टिक के थैलों का एक नायाब इस्तेमाल निकाला है. वो इनसे महिलाओं के लिए फ़ैशनेबुल हैंड बैग बना रहे हैं.
दिल्ली ही क्या भारत के सभी शहरों में प्लास्टिक के थैले एक बड़ी समस्या हैं जो सड़कें तो गंदा करते ही हैं साथ ही इनसे नालियाँ बंद हो जाती हैं और पर्यावरण प्रदूषण होता है.
अनीता और शलभ आहूजा दिल्ली की झुग्गी झोंपड़ी बस्तियों के लोगों से प्लास्टिक के थैले बटोरने का काम कराते हैं.
इन थैलों को पहले धोया जाता है फिर उनसे प्लास्टिक की चादरें तैयार की जाती हैं और इन चादरों से बनते हैं हैंड बैग.
श्रीमती आहूजा ने बीबीसी विश्वसेवा के आउटलुक कार्यक्रम को बताया, "हम कचरा प्रबंधन का काम पहले से कर रहे थे और हमें प्लास्टिक का कचरा बहुत मिलता था."
"बस हमने सोचा क्यों न इस समस्या का कोई समाधान निकाला जाए."
संभावनाएं
अनीता और शलभ आहूजा ने अपनी योजना को कार्यान्वित करने के लिए एक ग़ैर सरकारी संगठन बनाया जिसका नाम रखा कन्ज़र्व यानि संरक्षण.
प्लास्टिक के थैले इतनी बड़ी समस्या हैं कि हिमाचल प्रदेश राज्य ने तो इनपर प्रतिबंध लगा रखा है.
लेकिन दिल्ली में कन्ज़र्व संगठन कूड़ा बीनने वालों से शहर के कूड़ा घरों से प्लास्टिक बिनवाने का काम करवाता है.
कुछ औरतें इन थैलों के हैंडल काटकर अलग करती हैं, कुछ उन्हे पानी और डिटर्जैंन्ट से धोती हैं और फिर उन्हे सुखाया जाता है.
उसके बाद इससे प्लास्टिक की मोटी और टिकाऊ चादरें तैयार की जाती हैं जिनसे रंग बिरंगे हैंड बैग बनाए जाते हैं.
श्रीमती आहूजा कहती हैं कि उन्हे हैंड बैग बनाने का विचार तब आया जब उनकी एक मित्र ने जो कपड़े के थैले बनाती हैं उनसे प्लास्टिक की चादरें मांगी.
"मैंने जब पहला बैग बनाकर अपने मित्रों को दिखाया तो उन्होने उसे बहुत पसंद किया. बस मुझे लगा कि इस काम में काफ़ी संभावनाएं हैं."
आहूजा दम्पति का यह काम अब ख़ूब चल निकला है. उनके यहां 300 लोग काम करते हैं और लगभग 70 लाख रुपए का सालाना व्यापार होता है.
कन्ज़र्व के लिए काम करने वाली गीता पांडेय कहती हैं, "बहुत सी महिलाएं मेरे पास आती हैं और कहती हैं हम भी यहां काम करना चाहती हैं."
"मैं कुछ उपयोगी काम भी कर रही हूं. पॉलिथीन के थैले शहर की नालियों को रोकते हैं. जब गाएं इन्हे खा लेती हैं तो दम घुटने से मर जाती हैं. इन्हे हैंड बैग की शक्ल में तब्दील करने से इनका इस्तेमाल होता है और लोगों को काम भी मिलता है."
आहूजा दम्पति यह कोशिश कर रहे हैं कि सांस्कृतिक मंत्रालय इसे दस्तकारी के रूप में मान्यता दे.
लेकिन उन्हे इसमें अधिक सफलता नहीं मिल रही. शलभ आहूजा कहते हैं, मंत्रालय का कहना है कि अगर कोई शिल्प 500 साल पुराना नहीं है तो उसे दस्तकारी का दर्जा नहीं दिया जा सकता.