मंगलवार, 20 दिसंबर, 2005 को 22:34 GMT तक के समाचार
जयदीप कर्णिक
इंदौर से
शहंशाह-ए-ग़ज़ल जगजीत सिंह के एक अरसे बाद इंदौर में दीदार हुए. जगजीत की ग़ज़लों का ख़ुमार लिहाफ़ से निकल कर अभय प्रशाल में झाँकने लगा.
यों तो जगजीत सिंह मौसीक़ी के सदाबहार शहंशाह हैं, पर उनका लगभग चार साल बाद इंदौर आना और यूँ डूब कर गाना, संदूक में रखी ग़ज़लों के शौक़ को धूप दिखा गया.
दिसंबर की सिहरन भरी सर्द रात में मालवा की सरज़मीं पर उतरा ग़ज़लों की धूप का ये टुकड़ा ग़ज़ल प्रेमियों को गुनगुनी गर्माहट देता रहेगा.
उनके आने की चर्चा तो शहर में महीने भर से थी. महफ़िल का दिन करीब आते-आते कुछ शौक़ीनों से बात की तो जवाब मिला 'यार पिछली दो बार में उतना मज़ा नहीं आया'.
दीवानगी का आलम
जगजीत की दीवानगी का आलम ही ये है कि 101 फीसदी जगजीत से कम किसी को कुछ नहीं चाहिए, फिर चाहे वो खुद जगजीत ही क्यों न हों!!
इस पीढ़ी के अधिकतर लोगों ने ग़ज़ल का ककहरा ही जगजीत से सीखा है. सो इस लंबे अंतराल और पिछली प्रस्तुतियों की धुँधली यादों के बीच लग रहा था कि कहीं प्यास इस बार भी अधूरी न रह जाए...
अपनी पहली प्रस्तुति के रूप में जगजीत ने जब सरफ़रोश की लोकप्रिय ग़ज़ल ' होश वालों को ख़बर क्या..' की धुन छेड़ी तो तालियाँ तो खूब बजीं पर धूप का ये टुकड़ा सुबह सात बजे वाला साबित हुआ, जो दिखा तो सही पर गर्माहट न दे सका.
सजदा एलबम से आई दूसरी प्रस्तुति 'हर जगह हर कहीं बेशुमार आदमी...' से महफ़िल ने थोड़ी रफ़्तार पकड़ी. बस इसके बाद तो लगा की आज की शाम यादगार बनकर रहेगी.
'किसका चेहरा अब मैं देखूँ, तेरा चेहरा देख कर', 'ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो' और 'हुजूर आपका भी एहतराम करता चलूँ' जैसी अपार लोकप्रिय ग़ज़लों के साथ जगजीत एक-एक कर के ख़ुद के भीतर उतरते चले गए.
जितना वे ख़ुद में डूबते गए, श्रोताओं पर उतना ही उनका ख़ुमार चढ़ता गया. एहसास, अलफाज़ और आवाज़ के संगम पर जब जगजीत के खरज भरे गले ने डुबकी लगाई तो सुनने वाले निहाल हो गए.
'कल चौदहवीं की रात थी' के ख़ुमार पर छूटे महफ़िल के अंतराल के पहले वाले हिस्से से जब बाद में फरमाइशी दौर में 'झुकी-झुकी सी नज़र' का सिरा मिला तो रात अपने पूरे शबाब पर आ चुकी थी.
लंबे समय बाद अर्थ और साथ-साथ की ग़ज़लें लाइव कंसर्ट में सुनाई दीं. 'तुमको देखा तो ये ख़याल आया' और ' तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो' जैसे नग़मे स्कूल-कॉलेज की किताबों में बंद सूखे गुलाब को बाहर निकाल लाए.
रात-रात भर दोस्तों के साथ सुनी जगजीत की ग़ज़लें मानों पुराने दिनों को लौटा लाई. जगजीत के पंजाबी गानों की मस्ती पर तो श्रोता बस झूम उठे.
'सावन दा महीना यारों', 'ढाई दिन ना जवानी नाल चलदी' और 'चूल्हे आँगना घड़े दे विच' जैसे मस्ती भरे गीतों के बीच जब उन्होंने 'माटी दा बावा' की कसक भरी तान छेड़ी तो लगा मानो जगजीत खुद के भीतर ही खो गए.
महफ़िल को पूरा परवान चढ़ा कर जब जगजीत थमे, तो लगा...काश के ये महफ़िल सारी रात चलती.....
कार्यक्रम का आयोजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. ठाकुरदासजी खुजनेरी की स्मृति में किया गया था. मोंटाना ईवेंट्स एंड प्रमोशंस का यह कार्यक्रम कसावट भरा रहा लेकिन संचालन भी उतना ही दमदार हो पाता तो अच्छा रहता.