शनिवार, 26 नवंबर, 2005 को 22:28 GMT तक के समाचार
हाल में ही अकबर ख़ान की फ़िल्म 'ताजमहल: एन इटर्नल लव स्टोरी' सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई जो हिंदी सिनेमा जगत में अब तक की सबसे महंगी फ़िल्म है.
अक़बर ख़ान चाहते हैं कि इस फ़िल्म को पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग भी देख सकें क्योंकि ताजमहल सबकी साझा विरासत है.
निवेदिता पाठक ने अकबर ख़ान के साथ बातचीत की.
आपकी फ़िल्म ताजमहल से पहले भी इस विषय पर दो सफल फ़िल्में बन चुकी हैं इसी विषय पर फिर से फ़िल्म बनाने की कोई ख़ास वजह?
ताजमहल साढ़े तीन सौ साल पहले शहंशाह शाहजहाँ ने बनवाया था. इस पर दो फ़िल्में बन चुकी हैं. सबके अंदाज़ और देखने के नज़रिए अलग-अलग होते हैं.
यह फ़िल्म ताजमहल पर मेरी अपनी फ़िल्म है. इसमें मैंने इतिहास के उस दौर को अपनी नज़र से देखने की कोशिश की है. मुझे इस बात की बेहद ख़ुशी है कि इसे जनता ने बेहद पंसद किया है.
आज मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों का ज़माना है और नए निर्देशक छोटे बजट की फ़िल्में बना रहे हैं ऐसे में इस तरह की ऐतिहासिक फ़िल्म का कितना महत्व है?
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक फिल्में हमारे फ़िल्म उद्योग का हमेशा से एक अभिन्न अंग रही हैं.
आज ज़्यादातर फ़िल्मकार ये सोचते हैं कि ऐसी फ़िल्में जिनमें गहराई हो या हमारे इतिहास और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हों, उनको जनता अस्वीकार कर देगी, लेकिन ये बात ग़लत है.
बॉक्स आफ़िस रिकॉर्ड ये बताते हैं कि इतिहास में जो सबसे सफल फ़िल्में बनी हैं वो सारी की सारी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी हैं चाहे वो टेन कमांडमेंडस, मुग़ले-आज़म, लैला-मजनू या रोमियो-जूलियट हो.
इन फ़िल्मों में एक क्लासिक टच होता है. पश्चिमी सिनेमा की नक़ल की बजाय मैंने इन्हीं कारणों से अपनी जड़ों की खोज करने वाली फ़िल्म बनाने की सोची, जो आज आप सभी लोगों के सामने है.
ताजमहल अब तक की हिंदी सिनेमा की सबसे महंगी फ़िल्म है. इस फ़िल्म को बनाने में 70 करोड़ रुपए से ज़्यादा की लागत आई है, इसकी क्या कोई ख़ास वजह?
इतिहास और ऐतिहासिक पात्रों में मेरी हमेशा से ही गहरी दिलचस्पी रही है. उनकी बुलंदी और साहस से मैं काफ़ी प्रभावित रहा हूँ.
जब कभी मैं आसिफ़ साहब जैसे फ़िल्मकार की फ़िल्में देखता था तो सोचता था कि बड़ा होकर मैं भी इसी तरह की फ़िल्में बनाऊंगा.
यक़ीनन मेरी फ़िल्म उसी दर्जे की है और ये आज तक की सबसे कीमती फ़िल्म है, इसमें सिर्फ पैसा नहीं ख़र्च किया गया है, इसमें इतिहास के उस स्वर्णिम दौर के सौंदर्यबोध को, उसी मोहब्बत और ज़ज्बात के साथ उकेरा गया है.
मैंने इसे बनाते वक़्त छोटी से छोटी चीज़ों पर ख़ास ध्यान दिया है.
उस ज़माने के गहने, हीरे-जवाहरात, हथियार और रणनीति इन सबके बारे में हमने ऐतिहासिक तथ्यों का विशेष ध्यान रखा है.
लेकिन जिस ख़ास बात की तरह मैं इशारा करना चाहता हूँ कि ये फ़िल्म भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश की साझा विरासत को दिखाती है.
मैं पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ साहब से अनुरोध करना चाहता हूँ कि वो हमें इजाज़त दे कि हम इस फ़िल्म को पाकिस्तान में भी दिखा सकें.
ताजमहल से इन दोनों देशों का भी उतना सरोकार है जितना कि हमारा.