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रविवार, 02 अक्तूबर, 2005 को 09:48 GMT तक के समाचार

शुभ्रांशु चौधरी
अगरतला से लौटकर

त्रिपुरा भी याद कर रहा है एसडी बर्मन को

सचिन देव बर्मन अगर आज होते तो उम्र के सौंवे साल में प्रवेश कर चुके होते.

लेकिन न वे हैं और न उनके संगीतकार बेटे राहुल देव बर्मन आज दुनिया में हैं लेकिन उनका राज्य त्रिपुरा आज भी उन्हें याद करता है. भले ही थोड़े अफ़सोस के साथ.

अफ़सोस इस बात का कि सचिन एक बार जो यहाँ से निकले तो पलटकर नहीं देखा.

और आज किसे भरोसा होगा कि इस महान संगीतकार ने अपना घर गीत संगीत के लिए नहीं ज़मीन जायदाद और सत्ता के झगड़े की वजह से छोड़ा था.

सचिन देव बर्मन के भतीजे अंकुर देव बर्मन कहते हैं सचिन खूडा (स्थानीय भाषा में चाचा के लिए संबोधन) यद्यपि हमारे परिवार के थे पर हमारा दुर्भाग्य यह है कि अगरतला को सचिन खूडा से कुछ भी नहीं मिला.

दरअसल सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के राज परिवार के सदस्य थे और बॉलीवुड से उनका नाता एक संयोग भर था.

बॉलीवुड से रिश्ता

त्रिपुरा के राज परिवार और बॉलीवुड के संबंधों पर नज़र डालें तो रिश्ता काफ़ी गहरा लगता है.

इस रिश्ते की शुरूआत सचिन देव बर्मन से होती है जिसे राहुल देव बर्मन आगे ले जाते हैं.

पर कहानी यहीं थमती नहीं है. पहले मुनमुन सेन और अब उनकी दोनों बेटियां राइमा और रिया बॉलीवुड से त्रिपुरा के राज परिवार के उसी पुराने संबंध को आगे बढा रही हैं.

उल्लेख्ननीय है कि राइमा त्रिपुरा की एक नदी का नाम है और रिया यहां के आदिवासी महिलाओं के विशेष कमरबंद का नाम है.

ऐसा बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि बॉलीवुड को इतने दिग्गज देने वाला त्रिपुरा का राज परिवार भी एक आदिवासी परिवार है.

पर उससे भी चौंका देने वाला तथ्य यह है कि जिस शहर ने बॉलीवुड को इतना कुछ दिया वहां एक भी सिनेमा हॉल नहीं है.

कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में सिनेमा हॉल के फिर से खुल जाने के बाद आश्चर्यजनक रूप से संभवत: अगरतला देश की अकेली ऐसी राजधानी है जहां कोई सिनेमा हॉल नहीं है.

अगरतला का आखिरी सिनेमा हॉल रूपसी दो साल पहले बंद हो गया.

महफ़िलें

वैसे सचिन देव बर्मन का जन्म कुमिल्ला शहर में हुआ था जो त्रिपुरा राज्य का अंश था पर विभाजन के बाद बांग्लादेश में चला गया.

अंकुर याद करते हैं सचिन देव बर्मन के पिता की संगीत में बहुत रूचि थी.

उनके घर के बाहर एक पैरे की छत का विशाल दरबार था जहां अक्सर संगीत की महफिलें हुआ करती
थीं.

वे कहते हैं, "वहीं हमने उस ज़माने के सभी बड़े संगीतकारों को देखा व सुना है."

सचिन देव को संगीत का ज्ञान उनके पिता से ही मिला.

अंकुर बताते हैं कि इसके बाद ही गड़बड़ हो गई. तत्कालीन राजा के निधन के बाद सचिन खूडा के पिता की जगह उनके चाचा को राजा बना दिया गया.

इससे वे बहुत नाराज़ हुए और उसके बाद उन्होंने अगरतला से अपना नाता बिल्कुल तोड़ दिया.

इसके बाद वे सिर्फ अपने पिता के श्राद्ध में शामिल होने अगरतला आए.

सचिन देव के बेटे राहुल भी यहाँ सिर्फ एकबार अपना कार्यक्रम देने के लिए ही आए.

अंकुर बताते हैं कि उन्होने अगरतला से कोई भी रिश्ता नहीं रखा.

प्रयास

अंकुर देव बर्मन से भी अगली पीढ़ी के फ़ाल्गुन देव बर्मन सचिन दा के ही अंदाज़ में उनके गीत गाते हैं.

फ़ाल्गुन कहते हैं, "यह बड़े शर्म की बात है कि अगरतला ने सचिन देव से कुछ नहीं सीखा. अब हम इसे बदलना चाहते हैं."

त्रिपुरा की सरकार ने भी इस दिशा में प्रयास शुरू किए हैं.

त्रिपुरा के संस्क़ति मंत्री अनिल सरकार कहते हैं त्रिपुरा की सरकार एक अक्टूबर से वर्षव्यापी सचिन देव बर्मन शतवार्षिकी उत्सव की शुरूआत कर रही है जिसके तहत साल भर विभिन्न कार्यक्रम होंगे.

वे बताते हैं कि केंद्र सरकार से भी यह आग्रह किया गया है कि वे सचिन देव बर्मन के सम्मान में एक विशेष डाकटिकट जारी करे.