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सोमवार, 03 अक्तूबर, 2005 को 06:20 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
दिल्ली से

जंगल में फंस गए जानवर

अगर आप किसी शहरी परिवेश में पैदा हुए हों और कभी जंगल न देखा हो तो हो सकता है कि जंगल या दुनिया देखने निकले और वहां मुसीबतों में फंस जाएं पर क्या यकीन करेंगे इस बात पर कि जानवर जंगल में गए और वहाँ फंस गए.

जी, मैं कतई मज़ाक के मूड में नहीं हूँ. मैं बात कर रहा हँ पिछले हफ़्तों रिलीज़ हुई फ़िल्म मेडागास्कर की.

अंग्रेजी भाषा में बनी यह हास्य फ़िल्म ऐसे ही जानवरों की कहानी है, जो रहते तो शहर में थे, पर दुनिया देखने निकले और मुश्किलों में फंस गए.

फ़िल्म का निर्देशन किया है फ़िल्म निर्देशक कैरी क्रिकपैट्रिक ने.

इस फ़िल्म को दुनिया के तमाम देशों के अलावा भारत में भी लोगों और बच्चों ने इसे ख़ासा पसंद किया है.

ख़ुद राजधानी दिल्ली के कुछ शीर्ष सिनेमाघरों में यह फ़िल्म पिछले एक माह से दिखाई जा रही है.

कथानक

फ़िल्म में न्यूयार्क सेंट्रल पार्क चिड़ियाघर के रहनेवाले जानवरों की ज़िंदगी को दिखाया गया है.

यहाँ चार दोस्त जानवर रह रहे हैं. एलेक्स(शेर), मार्टी (ज़ैब्रा), मेलमान (ज़िराफ़) और ग्लोरिया नाम की एक मादा दरियाईघोड़ा.

वो शहरी परिवेश और मर्यादाओं, सीमाओं में रहनेवाले सभ्य जानवर बन चुके थे.

पर मार्टी को यह सूझता है कि वो दुनिया के बाकी हिस्सों को देखे. जो प्राकृतिक दृश्य उन्होंने चित्रों में देखें हैं, उन्हें वो जीवंत देखना चाहता है.

इसीलिए एक दिन वो अपने बाकी साथियों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ही वो चिड़ियाघर से भाग निकलता है और उसके पीछे उसके दोस्त भी उसे खोजने निकल लेते हैं.

न्यूयार्क के ग्रांड सेंट्रल स्टेशन पर वो सब पकड़े जाते हैं और फिर कुछ लोग उनकी आज़ादी का महत्व समझते हुए उन्हें एक अफ़्रीकी जहाज पर रवाना कर देते हैं.

पर यहाँ से उनकी ज़िंदगी में एक नई समस्या शुरू हो जाती है.

वो न तो वहाँ के खाने को लेकर अभ्यस्त हैं और न ही शेर को शिकार करना आता है. ऐसे में उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

भूखे शेर के लिए एक तरफ उसके दोस्त हैं और दूसरी ओर वही दोस्त उसका खाना हैं. इस तरह से अंत काफ़ी रोचक है.

तीखा व्यंग्य

14 वर्ष के सुमित को तो यह फ़िल्म काफ़ी पसंद आई और उसने तय किया है कि वो इसकी डीवीडी ख़रीदकर अपने पास रखेगा.

पर ऐसा नहीं है कि फ़िल्म केवल उसी को पसंद आई है. उसके साथ उसका पूरा घर भी है और सभी फ़िल्म देखकर ख़ुश हैं.

एक औऱ परिवार ने फ़िल्म पर टिप्पणी करते हुए कहा, "आजकल जिस तरह की फ़िल्में देखने को मिल रही हैं, उससे से तो बेहतर है कि ऐसी फ़िल्म देखी जाए. यह साफसुथरी भी है और कुछ हटकर भी और पूरे घर को फ़िल्म पसंद आई है."

पर यह फ़िल्म आज के महानगरीय परिवेश में पल-बढ़ रही नई पीढ़ी पर एक मज़बूत व्यंग्य भी है.

ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हीं सभ्य जानवरों के जैसी दिक्कतें उन लोगों को भी होती देखी जा सकती हैं, जो शहरी परिवेश और आधुनिकता में इतने डूबे हैं कि मिट्टी की पहचान भूल गए हैं.

फ़िल्म में प्रकृति से कटकर एक कृत्रिम जीवन जीने की कीमत क्या होती है, इसे भी समझाने की कोशिश की गई है.

फ़िल्म की डीवीडी की मुल प्रतियां भी भारतीय बाज़ारों में उपलब्ध हो गई हैं सो लोग इन्हें भी ख़रीद रहे हैं.