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शुक्रवार, 02 सितंबर, 2005 को 13:51 GMT तक के समाचार

'रीमिक्स अब बंद होना चाहिए'

कभी वे ‘कोलोनियल कजिंस’ के पॉप के साथ तालमेल बिठा रहे होते हैं तो कभी तबला उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ. उनका नया एलबम ‘डेस्टिनी’ दलेर मेंहदी के साथ है जिसे भांगड़ा और ग़ज़ल की जुगलबंदी कह सकते हैं.

पाकिस्तान में कई कार्यक्रम करके लौटे अनंत सुब्रमणि हरिहरन से मुंबई में अरुण अस्थाना ने बातचीत की-

अरसा हो गया आपकी आवाज़ में ताज़ा कुछ नहीं सुना. इतने दिन कहाँ थे.

हाँ..पिछला एलबम ‘काश’ था. उसके बाद रीमिक्स के बीच अपनी गायकी को ‘वेस्ट’ नहीं करना चाहता था. शोज़ करता रहा दुनिया भर में. एक्टिंग भी की एक तमिल फिल्म में. और एलबम तो काफी हो गए थे अब गिनती बढ़ाने के लिए एक और एलबम नहीं करना चाह रहा था. कुछ क्वालिटी, कुछ एक्साइटिंग देख रहा था.

आप जोड़ी खूब जमाते हैं, वह भी अनोखी जोड़ी, ऐसे लोगों के साथ जिनका ग़ज़ल से दूर-दूर का वास्ता नहीं दिखता....कभी ‘कोलोनियल कज़िंस’ कभी ज़ाकिर हुसैन और अब दलेर मेंहदी...क्यों. क्या अकेले मज़ा नहीं आता.

नहीं, मेरी फितरत है कि मैं कभी किसी भी बात से कतराता घबराता नहीं. ये नहीं सोचता कि ये करने से क्या होगा...वो करने से क्या होगा. मेरा ख़्याल है कि आप जब तक रूदारी से गाते रहेंगे, लोग सुनते रहेंगे. वैसे मुझे इस तरह गाना इंस्पायर भी करता है. ब्लैक और व्हाइट मिल कर जो रंग बनाते हैं वह अच्छा ही होता है. एक कंट्रास्ट होता है, चुनौती होती है- तालमेल बिठाने की, विविधता होती है. मेरी मां भी संगीतज्ञ हैं, कहती हैं कोई गाना छोटा बड़ा नहीं होता, संगीत केवल शास्त्रीय नहीं होता. बस सुर और अंदाज़ में गाइए. मैने तो इन कलाकारों के साथ काम करके खूब सीखा.

मुज़फ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ से आपने हिंदी फिल्मों में गाना शुरु किया था लेकिन अब आपकी आवाज़ कम ही सुनाई देती है क्या इससे भी जी ऊब गया.

देखिए जहाँ तक फिल्मों की बात है तो मैं दक्षिण की फिल्मों में लगातार गा रहा हूँ. रही हिंदी फिल्मों की बात तो असल में ‘रोज़ा’ के बाद बॉलीबुड के तमाम लोगों ने कहा कि हमने आपको अब तक नहीं पहचाना था पर अब पहचान गए. लेकिन एक तो हिंदी फिल्मों में अच्छे गाने कम बनते हैं इन दिनों…. फिर उनके दिमाग में मैं हमेशा शास्त्रीय गायक रहा. औऱ फिर यहां सिंगर को एक ही तरीके से गाना होता है बेहद कामर्शियल अंदाज़ में. मैं वैसे नहीं गा सकता, अपने तरीके से ही गाउंगा.

आपने अभी रीमिक्स का ज़िक्र किया था.....

(बात काट कर) हाँ, ये रीमिक्स तो बस....बंद हो जाने चाहिए ये रीमिक्स अब. वैसे इन्हें ठंड लगने लगी है थोड़ा कपड़े भी पहनने लगे हैं रिमिक्स में लोग. असल में लोगों को नाचने के लिए रिद्म चाहिए वो ये रीमिक्स दे रहे हैं और... लोग इन्हें देख रहे हैं, सुन नहीं रहे. तो ये संगीत देखने के लिए और नाचने के लिए है.

1974 में दूरदर्शन पर ‘शामे ग़ज़ल’ से सफर शुरु करने वाले हरिहरन ग़ज़लों का चुनाव कैसे करते हैं.

ग़ज़ल सरल हो, मायने हों, लिरिकल क्वालिटी हो...यानी गाई जा सकें. लफ्ज़ खूबसूरत हों, मानीखेज़ हों, बस.

अच्छा नए पुराने की बहस भी काफी पुरानी है, आप भी तीस साल से गा रहे हैं. बताइए किसके साथ सबसे अच्छा लगा. पहले के संगीतकार या आज के.

हाँ, बहस तो है पर मैं मानता हूँ कि प्रतिभा सब में है और होती है, रहमान में भी और जयदेव जी में भी. हाँ, सबका तरीका अलग-अलग होता है. मैंने सबसे ज़्यादा रहमान और इलैया राजा के साथ काम किया है. और रहमान के साथ काम करने में बड़ा आनंद आता है.