सोमवार, 01 अगस्त, 2005 को 14:06 GMT तक के समाचार
लमही से लौटकर विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता
31 जुलाई को, जब प्रेमचंद की 125 वीं सालगिरह मनाई जा रही थी, मैं उनके गाँव लमही में था. मैं स्वाभाविक रुप से चाहता था कि उनके स्मारक तक जाकर नमन कर सकूँ. लेकिन मैं ऐसा कर नहीं सका.
जब मैं दरवाज़े तक पहुँचा तो बाहर खड़े पुलिस के मुस्तैद अमले ने मुझे रोका और मेरा नाम पूछे बग़ैर कहा, "आप भीतर नहीं जा सकते क्योंकि आपका नाम इस सूची में नहीं है."
मेरे पास भीतर जाने की अपनी वजह थी और सिपाहियों के पास मुझे रोकने की अपनी.
वहां केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जो आने वाले थे.
जब राजनीतिक नेता पहुँचे तो दरवाज़ा खुला भी लेकिन तब न नमन की जगह बची थी न अवसर ही था.
तालियों से ज़्यादा गाली
फिर नेता पहुँचे प्रेमचंद के उस जर्जर मकान के सामने जिसे मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव क्षण भर पहले देखकर निकले थे.
वे ख़ासे उखड़े हुए से दिख रहे थे, पता नहीं क्यों. प्रेमचंद के मकान की खस्ता हालत देखकर या फिर जयपाल रेड्डी के रवैये से, जिन्होंने पहली बार सुबह फ़ोन करके बताया था कि वे देर से पहुँच रहे हैं.
शिलान्यास होना था प्रेमचंद अध्ययन केंद्र और शोध संस्थान का. हुआ भी. लेकिन जब तालियाँ बजनी थीं तब तक नेताओं की सुरक्षा में जुटे पुलिस वालों और मीडिया के मेरे साथियों के साथ विवाद इतना बढ़ गया था कि तालियाँ सुनाई ही नहीं पड़ीं.
अलबत्ता प्रेस फ़ोटोग्राफ़रों और पुलिस के बीच गाली गलौज की आवाज़ ज़रुर सुनाई देती रही.
सत्ता का रास्ता
लोग 1936 के बाद से ही पता नहीं क्यों इंतज़ार कर रहे हैं कि किसी दिन सरकार प्रेमचंद के गाँव की सुध लेगी, कुछ कार्य करेगी. लोग भी और साहित्यकार भी. हालांकि वे अभी भी धमकी देना बंद नहीं करते कि अगर सरकार ने कुछ नहीं किया तो वे ख़ुद कुछ कर लेंगे.
वाराणसी प्रगतिशील आंदोलन के अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा कि उनका संगठन सरकार को एक साल का समय देगा और यदि इस समय में कुछ नहीं होता तो वे अपनी ओर से धन संग्रह करना शुरु कर देंगे.
हालांकि वे इस बात को लेकर आश्वस्त ही दिखाई दे रहे थे कि सरकार कुछ करने वाली नहीं है.
फिर हुई जनसभा जिसमें जन कम थे और उनको घेरे हुए पुलिस वाले अधिक. मंच पर बैठे नेताओं के चेहरों पर मंच पर जाने से पहले से ही लिखा हुआ था कि वे बेहद उकताए हुए हैं.
इस कार्यक्रम को अधूरा छोड़कर दिल्ली लौटते हुए प्रेमचंद के पोते आलोक राय की टिप्पणी भी खरी थी, "एक तौर के बौखलाहट है, खीझ है और एक तरह की शर्मिंदगी भी कि ये क्या हो रहा है और यदि हो भी रहा है तो हम इसमें शामिल क्यों हो रहे हैं."
मैं भी वापस लौटा. लमही से निकलने वाले रास्ते पर सारी दुकानें बंद थीं क्योंकि नेताओं की सुरक्षा का सवाल था....रास्तों से लोगों को गुज़रने की पाबंदी थी क्योंकि वीआईपी गुज़रने वाले थे.
वही वीआईपी जो लोगों के अपने प्रेमचंद के कार्यक्रम में भाग लेने आए थे.
सरकार का कार्यक्रम असरकारी हो ही नहीं सकता.
सुपरिचित लेखक और कवि विनोद कुमार शुक्ल ठीक कहते हैं, "सत्ता का रास्ता जनता को हटाकर बनता है."