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रविवार, 31 जुलाई, 2005 को 15:28 GMT तक के समाचार

लमही से लौटकर विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता

लमही में शोध संस्थान बनेगा

प्रेमचंद के गाँव लमही में पिछले तीन-चार दिनों से चल रही गहमागहमी 31 जुलाई को अपने चरम पर थी.

प्रेमचंद की 125 वीं सालगिरह पर सरकार की ओर से घोषणा की गई है कि वाराणसी से लगे इस गाँव में प्रेमचंद के नाम पर एक शोध एवं अध्ययन संस्थान बनाया जाएगा.

इस घोषणा के लिए केंद्रीय मंत्री जयपाल रेड्डी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह वहाँ पहुँचे हुए थे.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद सरला माहेश्वरी भी वहाँ थीं और इसके अलावा कई वरिष्ठ साहित्यकार वहाँ मौजूद थे.

प्रेमचंद के जर्जर हो चुके मकान के जीर्णोद्धार का आश्वासन फिर एक बार दिया गया है.

सरकारी अमले ने पिछले तीन दिन जिस तरह इस कार्यक्रम के आयोजन में लगाए और रविवार को जिस तरह का आयोजन हुआ उसने इस बात को रेखांकित ही किया कि यह जनता के अपने लेखक प्रेमचंद का नहीं सरकार का आयोजन था.

रंग-रोगन

पिछले कुछ दिनों से कई सरकारी अमले लमही में उस मकान के सामने डेरा डाले हुए थे जहाँ प्रेमचंद कभी रहा करते थे.

एक बार किसी सरकार ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था जिसके चलते बाहर से तो यह फिर भी ठीक दिखाई देता है लेकिन भीतर से यह बिल्कुल खंडहर हो चुका है.

कई कमरों की छतें गिर गई हैं और दरवाज़े हैं भी तो नहीं के बराबर. सरकारी अधिकारियों ने इस मकान के सामने कुँए पर कुछ मरम्मत का काम किया.

इसके ठीक बगल में जो परिसर है वहाँ प्रेमचंद का जन्म हुआ था. इस परिसर में प्रेमचंद की एक मूर्ति लगी हुई है.

अधिकारियों ने इसे रंगपोत कर ठीक करने की कोशिश की थी लेकिन एक क्षण भी ठहर कर नज़र डाल लें तो पोल खुल जाती है.

नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर अधिकारी बताते हैं कि तीन-चार दिनों पहले ही सूचना मिली थी और इतने दिनों में इतना ही कुछ हो सकता था.

तैयारियों का आलम यह था कि शिलान्यास का पत्थर ही दो बार बदला गया. पहले मुलायम सिंह को विशिष्ठ अतिथि की जगह मुख्य अतिथि लिखने के लिए फिर सरला माहेश्वरी का नाम जोड़ने के लिए.

और हालत यह थी जब जयपाल रेड्डी और मुलायम सिंह यादव शिलान्यास की औपचारिकता पूरी कर रहे थे तो तालियाँ कम सुनाई पड़ रही थीं, मीडिया वालों और पुलिस के बीच हो रही हो रही बहस की आवाज़ ज़्यादा.

लोगों की राय

एक बड़ा सवाल था कि आम लोग इस आयोजन के बारे में क्या कहते हैं, अगर साहित्यकारों को भी आम लोगों में शामिल किया जा सके तो किसी को भी इस भरोसा नहीं है कि इतने तामझाम के बाद जो घोषणा की गई है वह कभी पूरी होने वाली है.

एक तो कारण यह है कि लोग इसे एक राजनीतिक घोषणा के रुप में देखते हैं और दूसरा यह कि प्रेमचंद को लेकर सरकारों की घोषणाओं और आश्वासनों को लमही की जनता लंबे समय से देख रही है और उसके पुराने अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं.

हालांकि सरकारों पर भरोसा न करने वाले लोग यह ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं कि वे ख़ुद इसके लिए कुछ करें. न लमही के लोग न देश के सब नामी-गिरामी साहित्यकार.