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गुरुवार, 28 जुलाई, 2005 को 20:23 GMT तक के समाचार

अरुण अस्थाना
मुंबई से

पर्दे पर कश्मीर और मिज़ोरम की पीड़ा

भारत में शुक्रवार को पर्दे पर आई दो फ़िल्मों की कहानी ऐसे दो राज्यों की पृष्ठभूमि में तैयार की गई है जिसमें एक ने हिंसा का दौर देखा है और एक देख रहा है.

'दंश' भारत के छोटे से उत्तरपूर्वी राज्य मिज़ोरम के उग्रवाद और फिर शांति समझौते की पृष्ठभूमि में बलात्कार का शिकार हुई एक मिज़ो लड़की की व्यथा है तो 'यहाँ' कश्मीर के हालात और वहां तैनात एक फ़ौजी अफसर और एक कश्मीरी लड़की की प्रेमकहानी.

ये दोनों फ़िल्में मुख्य पात्रों की कहानियों के साथ सामाजिक और राजनीतिक सरोकार भी रेखांकित करती चलती हैं.

'दंश' में खुले तौर पर तो 'यहाँ' में छिपे हुए अंदाज़ में लेकिन काफी तीखे तरीके से.

‘दंश’ मिज़ोरम में शूट की गई है तो 'यहाँ' जम्मू-कश्मीर में.

नए निर्देशक

'दंश' और 'यहाँ' बनाने की हिम्मत करना आसान नहीं है. वह भी तब जब दोनों के निर्देशकों की ये पहली फिल्में है.

ये दोनों फिल्में हाल में ही दिल्ली में ओसियान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का हिस्सा थी. 'यहाँ' को ओसियान में ज्यूरी का विशेष पुरस्कार मिला तो ‘दंश’ को दो विदेशी महोत्सवों में नामांकन.

‘यहाँ’ के निर्देशक सुजीत सरकार अब तक विज्ञापन फिल्मों में काफी नाम कमा चुके हैं तो ‘दंश’ की निर्देशक कनिका वर्मा निर्देशक हंसल मेहता की सह–निर्देशक रही हैं.

दिल्ली के ‘एक्ट वन थियटर ग्रुप’ के संस्थापक रहे सुजीत सरकार अपनी फ़िल्म को कश्मीर पर बनी तमाम फिल्मों से अलग बताते हैं.

वे कहते हैं,"अब तक हम कश्मीर पर बनी फिल्मों में ये दिखाते रहे हैं कि आम भारतीय कश्मीर के बारे में क्या सोचता है लेकिन ये कभी जानने या बताने की कोशिश नहीं की कि आम अमनपसंद कश्मीरी बाक़ी भारत के बारे में क्या ख़याल रखता है. और ये ख्याल पनप कैसे रहे हैं."

‘यहाँ’ में सुजीत सामाजिक राजनीतिक सच्चाइयां सीधे नहीं कहते. उनकी मदद की है पीयूष मिश्र के लिखे संवादों ने जो ‘बिटवीन द लाइंस’ काफी बातें साफ करते चलते हैं.

उम्मीद

फ़िल्म में कैप्टन अमन का मुख्य किरदार निभाने वाले अभिनेता जिमी शेरगिल इस फ़िल्म को अपने जीवन की सबसे यादगार भूमिका मान रहे हैं.

वह अपनी पहली फिल्म गुलज़ार की ‘माचिस’ के मुक़ाबले तो किसी को नहीं रखते लेकिन छात्र राजनीति पर आधारित फिल्म ‘हासिल’ की मुख्य भूमिका और ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में जीने के लिए तड़प रहे कैंसरग्रस्त ज़हीरभाई की उल्लेखनीय भूमिकाओं को अब तक अपनी अच्छी परफॉर्मेंस में गिनते रहे हैं.

वे अब कहते हैं,"यहाँ में मैं बहुत आगे निकल गया हूं."

सुजीत कहते हैं कि उन्होंने ये फ़िल्म अपनी ज़िद पर बनाई और उनके लिए बाज़ार महत्वपूर्ण नहीं था.

वे कहते हैं,"प्रेमकहानी इस फ़िल्म की डोर है पर लगभग पूरी तरह से कश्मीर में बनी ये फिल्म बार बार बताती है कि भारत के इस राज्य को लेकर झगड़ रहा कोई भी पक्ष पूरी तरह सही नहीं है और इसका खामियाज़ा सिर्फ आम कश्मीरी भुगत रहा है जो भारतीय सेना को ही अब भारत मानने लगा है."

कहानियाँ

‘यहाँ’ के मूल में उम्मीद है तो ‘दंश’ में शांति.

‘दंश’ मिजो शांति समझौते के वक्त की कहानी है. इस समझौते में मुख्य भूमिका निभाने वाले मिज़ो नेशनल फ्रंट के एक नेता की शांति की चाह और राजनैतिक महत्वाकांक्षा की उसकी पत्नी की बदला लेने की भावना से टकराव की कहानी.

यूँ ये फिल्म सीधे-सीधे तीन पात्रों की कहानी भी हो सकती थी पर इसे मिज़ो शांति समझौते के परिप्रेक्ष्य में कहना ही इसे महत्वपूर्ण बना देता है.

फ़िल्म की निर्देशक कनिका वर्मा कहती हैं,"ये पूरी कहानी जिस तरह के हालात की बात करती है वह भारत में केवल मिज़ोरम में ही था. पहले सशस्त्र संघर्ष फिर समझौता और फिर पूरी राजनीतिक कमान उन्हीं हाथों में आना जो बंदूक उठाए थे."

के के मेनन, सोनाली कुलकर्णी और आदित्य श्रीवास्तव की मुख्य भूमिकाओं वाली ‘दंश’ बना कर कनिका को उम्मीद है कि ये फिल्म सभी पूर्वोत्तर राज्यों की समस्याओं और हालात के प्रति बाकी देश के लोगों का ध्यान खींच सकेगी.