शनिवार, 25 जून, 2005 को 08:42 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बनारस से लौटकर
वो वर्षा की प्रतीक्षा में हैं और पानी बरसे, इसके लिए वो तपती धूप में हाथों में चप्पू थामे, आग बरसाते आकाश की ओर पानी की बूँदों की आस के साथ ताकते हुए पिछले कुछ दिनों से मल्हार गा रहे हैं.
हमने एक नाव ली और गंगा नदी में आगे बढ़े. कानों में मीठी तान ने रस घोल दिया और गर्मी का अहसास हल्का पड़ गया.
'अब तो बरसो महारानी, जग तरपै बिनु पानी' और 'बरन लागि भू, अब तो बरसौ' के सुर में ढले शब्द हमें सुनाई दिए.
कभी कजरी तो कभी निर्गुनिया गीतों से एकबार फिर इंद्र को रिझाने की कोशिश की जा रही है.
इन गीतों के ज़रिए इंद्र से पानी बरसाने का आह्वान किया जा रहा है और ये गीत गाने वाले नाविकों को विश्वास है कि उनके इस गीत से धरती की प्यास बुझेगी, उनकी आस पूरी होगी और घरों में चूल्हा जलेगा.
जी हाँ, मैं बनारस की बात कर रहा हूँ जहाँ लोगों की एक बड़ी तादाद उनके भरोसे जीती है, जो यहाँ घूमने या दर्शन करने के लिए आते हैं.
यहाँ घाटों के आसपास बसे तमाम नाविकों के लिए गंगा ही जीविका का एकमात्र साधन है.
पर पूर्वांचल के चढ़ते पारे ने इन लोगों से इनके रोज़ के ग्राहक छीन लिए हैं. बनारस में आजकल पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का अकाल है.
गर्मी के मौसम में तपते लू के थपेड़ों के आगे आस्थाएं बौनी हो गई हैं, ऐसा जान पड़ता है और इसका सीधा असर इन लोगों पर पड़ा है.
एक और एकलव्य
इन्हीं नाविकों के बीच अपनी नाव खेता हुआ भुवन हमें मिल गया.
भुवन निषाद वैसे तो जाति और काम से नाविक है पर गाता शास्त्रीय गीत है.
आजकल भुवन इंद्र को खुश करने में लगा है. वैसे वो कजरी गाता है, सावन में. पर आजकल गर्मी से वो भी परेशान है सो पानी बरसाने के गीत गा रहा है.
और लो, आज तो देवताओं ने जैसे उसकी सुन ही ली. नाम के लिए ही सही पर आकाश से पानी की कुछ फुहारें हमपर पड़ीं.
भुवन और भी झूम उठा. साथ ही उसके तमाम साथी, जो भाँग और चिलम के सहारे गर्मी से टकरा रहे थे.
पर भुवन ने इतना मीठा गाना और वो भी शास्त्रीयता का पूरा प्रभाव लिए, कहाँ से सीखा. पूछने पर भुवन बोला, "एकलव्य ने कहाँ से सीखा था. लोगों को मेरा गाना पसंद है. तमाम विदेशी पर्यटक भी मेरा गाना सुनते हैं और प्रशंसा करते हैं पर यह संगीत मुझे किसी घराने या बड़ें संगीत पंडित ने नहीं सिखाया."
गुरू गंगा
भुवन बताता है, "मैंने तो गंगा की लहरों से गाना सीखा है और गंगा ही मेरी गुरू हैं. किसी और गुरू में तो कुछ कमी हो सकती है पर मेरी गुरू में नहीं तो अच्छा क्यों नहीं गाउँगा."
भुवन केवल कजरी और मल्हार ही नहीं गाते, वो तमाम पॉप गीत भी पूरे मन से गाते हैं.
कुछ विदेशी पर्यटकों से उसने कुछ अंग्रेजी गीत भी सीख लिए हैं.
भुवन के साथ हम हरिश्चंद्र घाट होते हुए लौटे. पारा तप रहा था और एक दिन पहले ही बनारस में गर्मी से एक दर्जन से भी ज़्यादा लोगों की जानें गई थीं.
आज फुहारें पड़ीं तो बुनकरों की बस्ती से लेकर तमाम बड़े-बुज़ुर्गों ने भी पूरे उत्साह से उसका स्वागत किया.
पर भुवन अब कुछ और ही दर्द महसूस कर रहा था.
चलते-चलते भुवन ने गीत सुनाया, 'बरसन लागि अंगन बुँदिया राजा, तोरे बिन लागे न मोरा जिया....'