गुरुवार, 23 जून, 2005 को 10:09 GMT तक के समाचार
पीएम तिवारी
कोलकाता से
यह भारत में अपनी तरह का एक अनूठा व पहला फिल्मोत्सव है.
कहीं कोई पोस्टर या बैनर नहीं. लेकिन सिनेमाहाल के बाहर पहुंचते ही आपको इसके अनूठेपन का अहसास हो जाता है.
जी हां, यह 'गे फिल्म फेस्टिवल' यानी समलैंगिकों का फिल्मोत्सव है.
समलैंगिकों के विभिन्न संगठनों ने 'रेनबो प्राइड वीक' यानी गौरव सप्ताह के दौरान इसका आयोजन किया है.
इस दौरान कुल नौ फिल्मों का प्रदर्शन होना है और इनमें से ज़्यादातर पुरुष व महिला समलैंगिकों के विषय पर ही है.
इनमें 'माई ब्रदर निखिल' भी शामिल है.
इस समारोह को सिद्धार्थ गौतम फिल्म फेस्टिवल का नाम दिया गया है.
सिद्धार्थ गौतम दिल्ली के एक वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता थे. 1992 में कैंसर से उनकी मौत हो गई थी.
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में राज्य सरकार के नंदन थिएटर समेत विभिन्न सिनेमाहालों में इन दिनों इस फिल्मोत्सव का आयोजन हो रहा है. समारोह की आखिरी फिल्म ‘माई ब्रदर निखिल’ होगी.
'नई बात नहीं है समलैंगिकता'
समारोह के आयोजकों में एक संगठन 'साथी' के पवन धल का कहना है, "हम समाज में अल्पसंख्यक के तौर पर अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहते हैं. भारतीय समाज में समलैंगिकता कोई अजूबा नहीं है. ऋगवेद तक में इसका जिक्र किया गया है".
वे बताते हैं कि 'रेनबो प्राइड वीक' के दौरान 20 से 26 जून तक विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.
इनमें फिल्मोत्सव के अलावा एक खुला सत्र भी आयोजित किया जाएगा. इसके तहत मानवाधिकारों पर एक संगोष्ठी होगी.
सप्ताह के आखिर में समलैंगिकों की एक रैली निकाली जाएगी.
ढल का कहना है, "इस सप्ताह का नाम रेनबो यानी इंद्रधनुष पर इसलिए रखा गया है कि इंद्रधनुष खुशी के अलावा अनेकता में एकता का भी प्रतीक है".
फिल्म समारोह की अन्य फ़िल्मों में पिकू भालो आछे (बांग्ला) और कशिश भी शामिल हैं.
समलैंगिक आंदोलन के लिए 26 जून की तारीख़ काफी महत्वपूर्ण है.
वर्ष 1969 में इसी दिन अमरीका में उनके एक लोकप्रिय ठिकाने स्टोनवाल इन पर पुलिस के छापे के विरोध में समलैंगिकों ने वहाँ एक विशाल रैली का आयोजन किया था.
वहीं से समलैंगिक आंदोलन की शुरूआत हुई थी.
धल कहते हैं, "पुरुष और महिला समलैंगिक (गे एंड लेस्बियन) भी इसी समाज का हिस्सा हैं और उनको भी अपने पूरे अधिकार मिलने चाहिए."