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बुधवार, 08 जून, 2005 को 18:01 GMT तक के समाचार

मणिकांत ठाकुर
पटना से बीबीसी संवाददाता

पटना में 'लालू जी' 'आउट ऑफ़ स्टॉक'

खिलौने की दुकानों में बिक रहे 'लालू जी' नाम और 144 रुपए दाम वाले 'डॉल' की चर्चा बज़रिए मीडिया इन दिनों उछाल पर है.

कभी टेलीविजन धारावाहिक 'रामखेलावन सीएम एंड फेमिली' में तो कभी बॉलीवुड की फ़िल्म 'पद्मश्री लालू प्रसाद यादव' में. और न जाने कितने हास्य-व्यंग्य-कार्यक्रमों में चमकते लालू-चरित्र पर विवाद-प्रतिवाद का सिलसिला जारी है.

अब अगर खिलौना-उद्योग ने भी कार्टूनी-हास्य के राजनीतिक अवतार-पुरूष लालू प्रसाद का व्यावसायिक इस्तेमाल कर लिया गया तो क्या बुरा किया. लेकिन विवाद तो होना ही था क्योंकि इस नेता के नसीब में यही बदा है.

मुंबई स्थित 'स्पीडएज कॉर्पोरेशन' नाम के खिलौना-निर्माता ने दो-तीन महीना पहले ही इस गुड्डे को पटना के बाज़ार में उतारा था. लेकिन तब बात बनी नहीं और माल बिका नहीं.

पटना के दुकानदार बताते हैं कि बच्चे इस 'रबड़ डॉल' को देखकर मुस्कुराते ज़रूर थे पर ख़रीद लेने जैसी ललक उनमें पैदा नहीं होती थी.

अचानक पिछले हफ़्ते न जाने कैसे एक साथ कई अख़बारों और टेलीविज़न के पर्दों पर इस खिलौने की सचित्र ख़बरें उभर आईं. फिर क्या था, लालू जी की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लोग अपने दलीय चुनाव-चिन्ह “लालटेन” की तरह इस गुड्डे को ख़रीदने के लिए टूट पड़े.

देखते ही देखते पटना के बाज़ार से 'लालू जी' 'आउट ऑफ स्टॉक' हो गए.

अब विपक्ष के लोग इसे 'लालूई ड्रामा' की एक नई प्रस्तुति मान रहे हैं. राजद विरोधी नेताओं में से कोई इसे अंग्रेज़ी में 'गिमिक' और हिंदी में 'नौटंकी' बता रहा है तो कोई इसे लालूलीला का एक और 'फ्लॉप मीडिया शो' करार देने पर तुला है.

लेकिन खुद लालू प्रसाद अपने इस खिलौना अवतार पर गदगद होकर टिप्पणी कर चुके हैं, “चलिए अच्छा है, अब घर-घर में पल रहे कर्णधार (बच्चे) मेरे साथ खेलेंगे-कूदेंगे और कभी खिसियाकर मुझे पटकेंगे भी.”

कभी लालू, भालू, आलू और बालू की तुकबंदी वाला मज़ाकिया पात्र बना दिए जाने वाले लालू यादव किसी समय देश की राजनीतिक दशा दिशा को प्रभावित करने जैसी अहम भूमिका में पहुँचकर सब को चौंका देते हैं.

घपला-घोटाला, जातिवाद, परिवारवाद, कुशासन और न जाने कितने आरोपों से लगातार घिरे रहकर भी अलमस्त देहाती अंदाज़ वाले बोली-बर्ताव से लोगों को हंसाते रहना ही मौजूदा राजनीति की लालू शैली है.

ऐसा माना जा रहा है कि नेतानुमा कुर्ता-पायजामा धारी गुड्डे की शक्ल में निहित लालू-छवि पर चल पड़ी यह शहरी चर्चा सुदूर गाँव तक जाएगी.

लेकिन सवाल यह है कि इतना महंगा लालू रूपी खिलौना अभावग्रस्त ग्रामीण बिहारी बच्चा ख़रीदेगा कैसे? जवाब है अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ये खिलौने लालू जी बाँट भी सकते हैं.

वैसे अगर विशुद्ध मनोरंजन-भाव से देखा जाए तो सफेद बाल, गुलाबी गाल और गोल-मटोल चेहरे के बीच चमकती आँखों और अधखुले होठों की मधुर मुस्कान वाले इस 'लालू डॉल' का राजनीतिकरण एक मासूम अपराध जैसा लगता है.