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बुधवार, 25 मई, 2005 को 10:49 GMT तक के समाचार

विष्णु खरे
पत्रकार और फ़िल्म समीक्षक

'सुनील दत्त का स्थान भीष्म साहनी जैसा'

मैं सुनील दत्त को लगभग पहली फ़िल्म से देखता आया हूँ और मैंने उनकी आख़िरी फ़िल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस भी देखी है.

सुनील दत्त एक बहुत मेहनती अभिनेता थे जो ख़ास किस्म के सादगी भरे रोल करते थे.

वो जब रेडियो सिलोन की विज्ञापन सेवा में काम करते थे तो मैं बचपन में उन्हें सुना करता था और जब वे अभिनय में चले आए तो मुझे आश्चर्य हुआ था.

अगर मुझे यह कहने के लिए क्षमा करें तो मैं कहना चाहता हूँ कि अभिनेता बहुत बड़े वे कभी नहीं हो पाए. लेकिन वे एक बहुत मेहनती और उपयोगी अभिनेता थे.

चूँकि उनके चेहरे पर एक सादगी थी तो बिमल रॉय, हृषिकेश मुखर्जी आदि उन्हें एक आदर्शवादी युवक का रोल दिया करते थे और बाद में बीआर चोपड़ा ने भी उन्हें इसी तरह की भूमिका के लिए चुना.

उनका पंजाबी लहज़ा शायद उनकी कमज़ोरी थी जिसे वे कभी नहीं छोड़ पाए.

लेकिन उन्होंने एक लंबी पारी खेली.

प्रयोग

उन्होंने 'यादें' नाम की एक अजीबोग़रीब फ़िल्म बनाई थी जिसे शायद अब कोई याद करता ही नहीं.

इस प्रयोग फ़िल्म में उनके अलावा कोई कलाकार था ही नहीं. जो दूसरे कलाकार थे वे कार्टून की शक्ल में थे.

तो जो अब जाकर वूडी एलेन आदि ने शुरु किया कि कार्टून के साथ एक जीवित अभिनेता, यह सब सुनील दत्त बहुत पहले कर चुके थे.

फिर उन्होंने 'रेशमा और शेरा' बनाई और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े कलाकार को पहचाना और काम दिया.

मैं 'रेशमा और शेरा' को बार बार देखना चाहता हूँ क्योंकि उसकी फ़ोटोग्राफ़ी अद्भुत है, संगीत अच्छा है. सुनील दत्त ने 'मदर इंडिया' में जो भूमिका निभाई थी यह फ़िल्म उसका 'एक्सटेंशन' था.

मैं 'मदर इंडिया' भी देखना चाहूंगा हालाँकि वह फ़िल्म थोड़ी ज़्यादा नाटकीय हो गई थी. शायद महबूब साहब के मन में एक पुरानी औरत की याद थी इसलिए बिरजू का रोल थोड़ा ज़्यादा 'लाउड' हो गया.

फिर 'सुजाता' और 'धूल का फूल' में उनकी भूमिका बहुत अच्छी थी.

लेकिन दो फ़िल्मों में उन्होंने मज़ाहिया का रोल किया है. एक तो थी नूतन के साथ की 'मिलन' और दूसरी थी 'पड़ोसन'. इन दोनों फ़िल्मों में उनका अभिनेता उभर कर सामने आता है.

'मिलन' में सावन का महीना पवन करे 'सोर' गाना तो हालांकि मुकेश ने गाया लेकिन वह सुनील दत्त के व्यक्तित्व को पूरी तरह सामने लाता है. इसी तरह 'पड़ोसन' का वह युवक जिसे किशोर कुमार कहते हैं कि 'अरे नीचे से गा' और सुनील दत्त सुर को नीचा न करके बैठ जाते हैं, तो वह उनके व्यक्तित्व की सहजता को दिखाता है.

शादी का प्रतीक

उन्होंने नर्गिस से जो शादी की वह एक बड़ा प्रतीक था.

एक ऐसा हिंदू जो विभाजन के बाद मुंबई आया था उसने एक मुस्लिम अभिनेत्री से शादी की वह अपने आपमें एक बड़ा प्रतीक था. हिंदुस्तान की फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए भी वह एक बड़ा प्रतीक है.

वे जिस समय के थे वह नेहरू का ज़माना था. और जब उन्होंने नर्गिस से शादी की तो नर्गिस उनसे बहुत आगे थीं. उनका नेहरू और इंदिरा गाँधी के साथ संपर्क था.

नर्गिस की तस्वीरें भी दिखाई देती हैं दोनों के साथ.

सुनील दत्त की राजनीति में रुचि थी और वे स्वाभाविक रुप से इंदिरा गाँधी की ओर गए. वे उनके साथ इसलिए भी गए क्योंकि उनकी रुचि धर्मनिरपेक्षता में थी और जैसी शादी सुनील दत्त ने की थी उसके बाद वे इसके अलावा कुछ और हो भी नहीं सकते थे.

राजनीति और सदमा

अगर आप अमिताभ बच्चन की राजनीति देखें तो समझ में आता है कि उनकी राजनीति कितनी जल्दी उतर गई और फिर उन्होंने राजनीति को किस तरह भला बुरा कहा और अब वे फिर एक दूसरी तरह की राजनीति कर रहे हैं जो हम सब को समझ में आ रही है.

लेकिन दूसरी ओर सुनील दत्त की राजनीति एकदम दूसरी है. वे राजनीति में संत की तरह रहे.

कई बार मुझे लगता है कि सुनील दत्त का वही स्थान हो सकता है जो साहित्य में भीष्म साहनी का था. वे हमेशा साफ़ सुथरे रहे और विवादों से अलग रहे.

उनके साथ एक चीज़ तो अच्छी रही कि उन्हें मंत्री बनाया गया. इससे उन्हें बहुत सुख मिला होगा.

30 सालों के राजनीतिक संघर्ष के फल की तरह यह पद उन्हें मिला. भले ही उन्हें ऐसा कोई मंत्रालय नहीं दिया गया जिसमें वे कोई काम कर सकें.

मैं उन्हें कांग्रेस का वार हॉर्स कहता हूँ. आप उसे कोल्हू का बैल कह सकते हैं.

लेकिन जिस तरह शिवसेना के एक बदनाम नेता को जिस तरह कांग्रेस में लाया गया उसका सदमा ज़रुर उनको रहा होगा.

यह एक प्रतीक भी है कि शिवसेना के एक नेता को कांग्रेस में लाया जाता है और इसके कुछ दिनों बाद उसी संसदीय क्षेत्र के कांग्रेस सांसद नेता की मृत्यु हो जाती है.

मैं नहीं कह रहा हूं कि उनकी मौत का कारण भी यही होगा लेकिन इसका सदमा तो ज़रुर रहा होगा.

कहीं ऐसा नहीं हो कि एक नरम हिंदुत्व का जो विकल्प इंदिरा गाँधी ने दिया था जिसके कारण बहुत गड़बड़ी हुई वैसा ही एक कट्टर हिंदुत्व का विकल्प सोनिया गाँधी और उनके समर्थक अपना रहे हों.

लेकिन इसका असर सुनील दत्त जैसे एक ग़रीब नेता पर बुरा पड़ा है. यह दुखद रहा.

मैं उनको ग़रीब इसलिए कहता हूँ कि जिस पृष्ठभूमि से वे आए उसके चलते एक ख़ास तरह की ग़ुरबत उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रही. वे कभी विवादों में नहीं पड़े और राजनीति से कभी पैसा नहीं कमाया.

(जैसा उन्होंने विनोद वर्मा को बताया)