बुधवार, 25 मई, 2005 को 16:19 GMT तक के समाचार
सायरा बानो
फ़िल्म अभिनेत्री
दत्त साहब को मैं तब से जानती हूँ जब मैं सोलह साल की थी. हैरत की बात यह है कि तब से उनमें कोई भी तो बदलाव नहीं आया.
उनके जैसा सीधा, सरल आदमी मिलना मुश्किल है. मैंने उन्हें हर हाल में मुसकुराते देखा है.
क्या-क्या परेशानियाँ उन्होंने नहीं झेलीं. पहले नर्गिस जी की बीमारी और फिर संजू पर आई मुसीबतें.
मेरे लिए वह एक सह अभिनेता ही नहीं थे. वह हमारे अच्छे दोस्त होने के अलावा पड़ोसी भी थे.
बल्कि यूसुफ़ साहब का तो हमेशा यही कहना था कि सुनील दत्त उनके छोटे भाई हैं.
अकसर हमारे घर आते और फिर यूसुफ़ साहब और वह घंटो बैठ कर संजू के बारे में मशविरा करते थे.
वह स्वभाव से ही नहीं अपने रहन-सहन और खानपान के हिसाब से भी बहुत सीधे थे.
एक ख़ास क़िस्म की दाल और सूप, यह उनका खाना होता था जब वह हमारे घर आते थे.
मैंने उनके साथ कई फ़िल्में कीं-नहले पर दहला, काला पानी और पड़ोसन वग़ैरा.
पड़ोसन में उनका कॉमेडी रोल था और वह कोई हैरानी की बात नहीं थी क्योंकि उन्हें कभी संजीदा तो देखा ही नहीं गया.
उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट रहती थी.
मुझे समझ नहीं आ रहा है उन्हें किस तरह याद करूँ. वह इतने अच्छे इंसान थे कि इस तरह के लोग कम ही होते हैं.
मेरा और यूसुफ़ साहब का तो यह निजी नुक़सान है.
(सलमा ज़ैदी के साथ बातचीत पर आधारित)