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गुरुवार, 12 मई, 2005 को 10:24 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
दिल्ली से

जिसे न देखना हो न देखे: पूजा बेदी

अभिनेत्री पूजा बेदी मानती हैं कि लोकतंत्र में सबको इस बात का अधिकार है कि वह क्या पहने और क्या न पहले. ऐसे में कोई कुछ भी पहने. जिसे देखना हो, देखे, जिन्हें न देखना हो, न देखे.

वैसे पूजा बेदी आजकल एक लाइफ़ स्टाइल चैनल के लिए चर्चित शो, ‘जस्ट पूजा’ की एंकर के रूप में छोटे पर्दे पर दिखाई दे रही हैं.

इस शो में वो समलैंगिकता से लेकर बाँझपन और तलाक़ जैसे मुद्दों पर बातचीत करती हैं.

कभी मॉडलिंग और फिर फ़िल्म 'जो जीता वही सिकंदर' के साथ बॉलीवुड की फ़िल्मों में अपनी किस्मत आज़माने पहुँची पूजा बेदी पिछले दिनों एक कार्यक्रम के लिए दिल्ली आईं तो उन्होंने कई सवालों के जवाब दिए. प्रस्तुत हैं इसी बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

आज की पूजा बेदी को किस रूप में देखें? कबीर बेदी और प्रोतिमा बेदी की बेटी के रूप में, एक मॉडल या अभिनेत्री या फिर और कुछ?

देखिए, आज की पूजा को एक टीवी शो एंकर के रूप में जाना जा रहा है. मैं ज़ूम चैनल के लिए अपने शो, जस्ट पूजा के लिए काम कर रही हूँ. ये शो अपने आप में बहुत अलग है. मैं इसे अब तक के सबसे अच्छे शो के रूप में देखती हूँ. अलग-अलग क़िस्म के लोगों को लाया जा रहा है. शो में तलाक से लेकर समलैंगिकता तक और बाँझपन से लेकर तमाम ऐसे कहे-अनकहे मुद्दों पर बात होती हैं, जो लोगों के लिए काफ़ी महत्व रखते हैं.

बड़े पर्दे से छोटे पर्दे का रुख़ करने के पीछे की कोई ख़ास वजह?

मैं फ़िल्मों के लिए काम कर रही थी और उस काम से ख़ासी ख़ुश भी थी पर उसी दौरान मेरी शादी हो गई और मेरे पति ने मेरे फ़िल्मों में काम करने पर आपत्ति की. मैंने उनकी बात मान ली और मैं एक संपूर्ण पत्नी, माँ और घर का कामकाज सँभालने वाली महिला की तरह रहने लगी.
 हम एक लोकतंत्र में रह रहे हैं. यह व्यक्तिगत चुनाव की बात है. जिसे देखना हो देखे, जिसे न देखना हो, न देखे. अगर वो बिक रहा है तो इसका मतलब है कि लोग ऐसा चाहते हैं और लोग जो चाहते हैं, वो होता ही है
 

फिर मेरी शादी टूट गई और मुझे लगा कि कुछ काम करना चाहिए. मुझे कई बड़े निर्देशकों की फ़िल्मों में काम करने के ऑफ़र मिले पर मैंने सोचा कि मेरे लिए बेहतर यह होगा कि मैं कोई दूसरा चरित्र निभाने की जगह पूजा ही बनूँ, न कि कोई रेखा, देविका या प्रिया.

ऐसी ख़बर है कि आप कोई किताब भी लिख रही हैं?

मेरी यह किताब गर्भावस्था पर है. मैं काफ़ी समय से इसपर मेहनत कर रही हूँ. अब मुझे लगता है कि मैं काफ़ी समय तक इस किताब को अपने गर्भ की तरह पाल चुकी हूँ, अब इसे बाहर आना चाहिए.

बॉलीवुड की फ़िल्मों में अंग प्रदर्शन जिस तरह बढ़ा है, उसे आप किस तरह देखती हैं?

देखिए, हम एक लोकतंत्र में रह रहे हैं. यह व्यक्तिगत चुनाव की बात है. जिसे देखना हो देखे, जिसे न देखना हो, न देखे. अगर वो बिक रहा है तो इसका मतलब है कि लोग ऐसा चाहते हैं और लोग जो चाहते हैं, वो होता ही है.

पर क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हॉलीवुड की तुलना में बॉलीवुड में फ़िल्मों का दायरा अभी भी सिमटा हुआ ही है?

ऐसा नहीं है, मेरी समझ में हॉलीवुड की मार्केटिंग बहुत ज़बरदस्त है जिसकी हमारे यहाँ कमी ही है. फिर भी कई अच्छी फ़िल्में बनी हैं और बन रही हैं.

वो हमसे तकनीकी रूप से आगे हैं लेकिन हमारे यहाँ भी मज़बूत पटकथाओं पर फ़िल्में बन रही हैं.