बुधवार, 04 मई, 2005 को 11:43 GMT तक के समाचार
शालिन जोशी
देहरादून से
उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदी के जानेमाने कवि त्रिलोचन को गांधी पुरस्कार देने की घोषणा की है.
हिंदी सॉनेट के शिखर पुरूष कहे जाने वाले त्रिलोचन उम्र के आखिरी पड़ाव पर गुमनाम जीवन जीते हुए बीमारी से जूझ रहे हैं. वह हरिद्वार में रहते हैं जहाँ उनकी बहू उनकी देखभाल करती हैं.
बिस्तर पर बिल्कुल शिथिल और निश्चेष्ट से लेटे हुए त्रिलोचन की आंखों में हांलाकि वही चमक दिखती है जो सालों पहले रही होगी जब उनका लिखा हुआ एक-एक शब्द मील का पत्थर बन जाता था. और न ही उनके लिखने का जज़्बा कम हुआ है.
हांलाकि मधुमेह, ब्लड प्रेशर और ट्यूमर की बीमारी के कारण अब उनका शरीर साथ नहीं दे रहा है. वो हंसते हुए कहते हैं, "तबियत कुछ ठीक नहीं है.
ये पूछे जाने पर कि क्या आपका अब भी लिखने का मन करता है वो अस्फुट से शब्दों में कहते हैं,"हां-हां क्यों नहीं,पुरानी बातों को लिखना चाहता हूं लेकिन याद कुछ ठीक से नहीं आती.
अब शायद याददाश्त नहीं रही. जब याद आएगा तब लिखूंगा".
ऐसा लगता है कि जीवन की इस अंतिम बेला में त्रिलोचन अपनी ही चर्चित कविता अपराजेय की इन पंक्तियों का प्रतीक बन गये हैं-
'भाव उन्हीं का सबका है,
जो थे अभावमय,
लेकिन अभाव से तपे नहीं,
जागे स्वभाव में थके'
हरिद्वार के ज्वालापुर इलाके में लोहामंडी की एक तंग गली में जहां त्रिलोचन रहते हैं शायद किसी को इस बात का भान तक नहीं है कि उनके बीच हिंदी का इतना बड़ा जनकवि रहता है.
त्रिलोचन की बहू उषा सिंह कहती हैं कि साहित्य की दुनिया के कुछ लोग कभी-कभी दर्शन के लिये जरूर आ जाते हैं लेकिन समाज और शासन के स्तर पर कभी किसी ने सुध नहीं ली.
नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन की त्रयी आधुनिक हिंदी कविता का आधारस्तंभ मानी जाती है.
त्रिलोचन की गिनती छायावाद के बाद के सबसे महत्त्वपूर्ण कवियों में की जाती है खासतौर पर उन्हें हिंदी सॉनेट का साधक माना जाता है.
शेक्सपियर ने सॉनेट की जिस विधा को बुलंदियों तक पंहुचाया था त्रिलोचन ने उसको भारतीय परिवेश में ढाला .
उन्होंने करीब 550 सॉनेट की रचना की और इसके अलावा कहानी, गीत, ग़ज़ल और आलोचना से भी हिंदी साहित्य को समृद्ध किया.
जनसमाज से जुड़े विषय और थके-हारे, उपेक्षित और मेहनतकश लोग उनके लेखन का अंग रहे.
साहित्यकार के साथ-साथ त्रिलोचन जुझारू व्यक्तित्व के भी धनी रहे.
त्रिलोचन को अपना काव्यगुरू बताते हुए प्रसिद्ध कवि लीलाधर जगूड़ी याद करते हैं, "त्रिलोचन ने हमें कम साधनों में जीना सिखाया, वो अपनी कविता के साथ सड़कों पर साइकिल लेकर निकल पड़ते थे और वो भी साइकिल चलाते नहीं उसे लेकर चलते थे".
त्रिलोचन एक साल पहले तक सक्रिय थे. 2004 में ही 'जीने की कला' नाम से उनका काव्य संग्रह आया जो खूब चर्चित रहा.
'मेरा घर', 'ताप के ताए हुए दिन', 'चैती', 'देशकाल', 'अनकहनी भी कुछ कहनी है' उनकी कुछ अन्य मशहूर किताबें हैं.
उनके सुधी पाठकों की शायद यही चाहत होगी कि त्रिलोचन जल्दी से जल्दी स्वस्थ हों और एक बार फिर अपनी क़लम से हिंदी को समृद्ध करें.