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शुक्रवार, 15 अप्रैल, 2005 को 12:44 GMT तक के समाचार

'मोहब्बत सबसे बड़ा मज़हब है’

पिछले दिनों दिल्ली में संगीत की एक रात सजी और मुलाक़ात हुई पाकिस्तान के मशहूर सूफ़ी कलाम गायक इक़बाल बाहू से.

इक़बाल बाहू किसी संगीत घराने से नहीं हैं पर आज तमाम संगीत घरानों से आगे निकलकर अपनी आवाज़ से लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं.

कभी मोहम्मद इक़बाल पर अब इक़बाल बाहू के नाम से जाने जानेवाले लाहौर के इस गायक से जब नाम के बदल जाने की वजह पूछी तो वो बोले, “तूने जो नाम मोहब्बत में मुझे बक्शा था,
अब उसी नाम से दुनिया मुझे पहचानती है.”

प्रस्तुत है पाणिनी आनंद से इक़बाल बाहू की बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

इक़बाल साहब, भारत में गाते हुए कैसा महसूस कर रहे हैं?

जो ख़ुशी होती है, उसे बयान नहीं कर सकता. लोगों का इतना प्यार, इतनी मोहब्बत और इतना हौसला मिलता है कि मंच से जब उतरता हूँ तो ज़िंदगी माँगने को जी चाहता है.

सूफ़ी कलाम को गाते हुए जब आप भारत और पाकिस्तान के संबंधों के बारे में सोचते हैं तो क्या महसूस करते हैं.

देखिए, सबसे बड़ा मजहब तो मोहब्बत और प्यार का है. जो लोग अपने को मिटाकर दूसरों से प्यार करते हैं, वो लोग ज़िंदा रहते हैं. आज ये तमाम सूफ़ी बुज़ुर्ग इसीलिए ज़िंदा हैं क्योंकि इन्होंने लोगों को पैग़ामे-मोहब्बत दिया है. नफ़रत आज की ज़रूरत नहीं है.

आज सूफ़ी संगीत को लेकर नए तरह के प्रयोग हो रहे हैं, इसे आप किस तरह से देखते हैं

संगीत को लेकर ढेर सारे प्रयोग चल रहे हैं और कई लोगों ने कई तरह से कलामों को गाया है. हर आदमी अपनी अकीदत का इज़हार करता है. जो जिस रूप में कलाम को समझता है, उसी के मुताबिक गाता है.

मैं समझता हूँ कि किसी भी तरह से गाने से पहले इतना ज़रूर ध्यान रहना चाहिए कि कलाम में क्या कहने और किस तरह कहने की कोशिश की गई है.

सुर का पैग़ाम शोर से नहीं दिया जा सकता है. जो बात प्यार से कहने की है, उसे डाँटकर नहीं कहा जा सकता न.

किस तरह के कलाम को आप सबसे ज़्यादा तवज्जो देते हैं.

मेरे लिए तो हजरत सुल्तान बाहू का कलाम-ए-बाहू ही सबकुछ है. इसको गाने के बाद और कुछ भी नहीं गा पाता. वैसे हीर वारिश शाह, शाह हुसैन, मियां सैफ़ुल, ख़्वाज़ा फ़रीद सहित तमाम दूसरे सूफ़ी संतों का कलाम गाता रहा हूँ.

मुझे हीर वारिश शाह का कलाम गाने के लिए नेशनल अवार्ड भी मिला लेकिन बाहू का कलाम गाकर मुझे नाम मिला.

हिंदुस्तान में किसकी आवाज़ आपको ख़ास पसंद आती है.

ऊपरवाले ने जिसे भी आवाज़ दी, वो सारी अच्छी हैं. हाँ मगर यहाँ सबसे ज़्यादा मुझे रफ़ी साहब की आवाज़ पसंद आती है और फिर लता जी की आवाज़ के तो कहने ही क्या.