गुरुवार, 03 मार्च, 2005 को 21:00 GMT तक के समाचार
गुजराज दंगों पर आधारित वृत्त-चित्र 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' के निर्माता राकेश शर्मा को पिछले दिनों लंदन में पुरस्कृत किया गया. इस वृत्त-चित्र को पहले तो सेंसर बोर्ड की ओर से हरी झंडी नहीं मिली थी मगर फ़िल्म निर्माताओं के व्यापक अभियान के बाद सेंसर बोर्ड ने इसे पास कर दिया.
शिवानी शर्मा ने राकेश शर्मा से लंदन में मुलाक़ात की. उनसे की गई बातचीत के कुछ अंश....
आपने गुजरात दंगों जैसा संवेदनशील मुद्दा ही क्यों चुना?
देखिए, ये मुद्दा मैंने इसलिए चुना क्योंकि आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर सरकार की मदद से जो हिंसा हुई वो हमारे इतिहास में एक अहम मोड़ था तो मुझे लगा कि इस पर वृत्त-चित्र बनाने की ज़रूरत है. इस विषय पर बहस और चर्चा की आवश्यकता भी है.
गुजरात दंगों की बात करें या फिर बँटवारा हो, हालांकि अब इतिहास है मगर ये घटनाएँ, ये ग़लतियाँ दोबारा न हो इसके लिए लोगों को जागरूक बनाने में वृत्त-चित्र निर्माता की आप क्या भूमिका देखते हैं?
आपकी डॉक्युमेंट्री को भारत में कोई ख़ास पहचान नहीं मिली है मगर दुनिया भर में अलग-अलग देशों में 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' दिखाई है और उसके लिए आपको कई पुरस्कार भी मिले हैं. कैसा लगता है आपको?
जी, पहचान नहीं मिल रही है और ये थोड़ा अजीब लगता है कि मेरी दोनों फ़िल्मों को हर एक भारतीय फ़िल्म समारोह में ये कहकर ख़ारिज किया गया कि ये फ़िल्म अच्छी नहीं है. मेरे दोनों वृत्तचित्रों को कई पुरस्कार मिले हैं. मेरे पहले वृत्तचित्र 'आफ़्टर शॉक' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 12 पुरस्कार मिले हैं और 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' को 15 पुरस्कार मिले हैं तो मुझे दुःख तो होता है कि ऐसा कुछ हो रहा है मगर साथ-साथ मुझे आश्चर्य भी नहीं होता है क्योंकि ये जो तमाम समारोह और पुरस्कार हैं ये सरकारी तंत्र के क़ब्ज़े में हैं. भारतीय जनता पार्टी या कॉंग्रेस या फिर जनता दल किसी भी पार्टी की सरकार हो अगर आप ऐसी फ़िल्म बनाएंगे जो उनकी राजनीति या फिर नीतियों पर सवाल खड़े करती है तो उन्हें वो पसंद नहीं आती है.
मैं यह कहना चाहूँगा कि हमारे राजनीतिक वर्ग को थोड़ा समझदार हो जाना चाहिए और ये मान लेना चाहिए कि लोगों के जनतांत्रिक हक़ है कि वो उन नेताओं से अलग विचार रखें, उनकी आलोचना करें, बहस और चर्चा के मुद्दे बनाए ताकि हम सब एक बेहतर समाज की तरफ़ जा सकें.