सोमवार, 15 नवंबर, 2004 को 16:04 GMT तक के समाचार
सलीम रिज़वी
न्यूयॉर्क से
अमरीका में एक ऐनिमेशन फ़िल्म बनी है जो इस्लाम धर्म के आख़िरी पैग़ंबर मोहम्मद के जीवन पर आधारित है.
बद्र इंटरनेशनल नाम की एक कंपनी ने यह फ़िल्म बनाई है और इसे नाम दिया है, 'मोहम्मद, दी लास्ट प्रॉफेट'.
यह ठीक ईद वाले दिन यानी रविवार को ही अमरीका और कनाडा के करीब 40 शहरों के सिनेमाघरों में दिखाई गई जिनमें न्यूयॉर्क, शिकागो, टोरोंटो, लॉस एंजलेस और फ़्लोरिडा के कई शहर शामिल हैं.
डेढ़ घंटे लंबी इस फिल्म की कहानी इस्लाम के पहले के अरब समाज से शुरू होकर इस्लाम के शुरूआती दौर में उसके फैलाव में पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद की जद्दोजेहद के बारे में है.
एक हफ्ते तक चलने वाली इस फिल्म का मुसलमानों और ग़ैर-मुस्लिमों दोनों में जम कर प्रचार किया जा रहा है और फिल्म की डिस्ट्रीब्यूटर कंपनी फ़ाइन मीडिया ग्रुप को उम्मीद है कि भारी संख्या में लोग इसे देखने आएंगे.
इस फिल्म को कैलिफ़ोर्निया के स्टूडियो में बनाया गया है और इसका निर्देशन डिज़नी कार्टून फिल्मों के मशहूर निर्देशक रिचर्ड रिच ने किया है.
मशहूर एमी पुरस्कार पाने वाले संगीतकार विलियम किड ने इसमे संगीत दिया है.
अमरीका की एक मुसलिम संस्था काउंसिल ओफ अमेरिकन इस्लामिक रिलेशन्स की निहाद अवद को इस फिल्म से काफी उम्मीद है.
वह कहती हैं, “यह इस्लाम धर्म के मानने वालों के लिए एक बहुत अच्छा मौक़ा है जिससे वह हज़रत मोहम्मद और इस्लाम के बारे में ही नहीं बल्कि उन हालात के बारे में भी जान सकेंगे जो विश्व के इतिहास का अहम हिस्सा हैं. और इस तरह की फिल्म के दिखाए जाने के साथ मुसलमानों और अमरीकियों को मेल जोल बढाने का भी मौक़ा मिलेगा.”
लेकिन इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए खुद फिल्म थिएटर वाले नहीं तैयार हुए क्योंकि उन्हें यह फ़ायदे का सौदा नहीं लगा.
इसलिए फिल्म की डिस्ट्रीब्यूटर कंपनी ने खुद ही सिनेमाघर बुक कराए और खुद ही टिकट बेचे.
लेकिन मुसलमानों को आमतौर पर इस बात का भरोसा है कि इस फ़िल्म के दिखाए जाने से आम अमरीकीयों में इस्लाम के प्रति जानकारी बढ़ेगी और उनहे मुसलमानों को बेहतर तौर पर समझ पाने में मदद मिलेगी.
इस फ़िल्म को बनाने में कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी, लॉस एंजलेस और जार्जटाउन यूनिवर्सिटी के विद्वानों के अलावा मिस्र के अल अज़हर इस्लामिक संस्थान के विद्वानों की मदद और सहमति भी ली गई थी.
दो साल की गहन छानबीन के बाद ही इन विद्वानों ने इस फ़िल्म को अपनी सहमति दी.
एक सबसे बड़ा मुद्दा था कि इसमें पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद को कैसे दर्शाया जाए क्यूंकि इस्लाम में उनका चित्रण किया जाना वर्जित है. इसलिए सिर्फ़ आवाज़ के सहारे ही उनको दिखाया गया है.
और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म के सारे पात्र फ़र्राटे की अंग्रेज़ी बोलते हैं.
यह फ़िल्म 2001 में ही बन कर तैयार हो गई थी लेकिन 11 सितंबर के बाद बिगड़े हालात की वजह से इसे पहले नहीं रिलीज़ किया गया था. इस फिल्म को बनाने में करीब एक करोड़ डॉलर की लागत आई है.