शुक्रवार, 12 नवंबर, 2004 को 03:50 GMT तक के समाचार
आमना ऐहतेशाम
दुबई से
नीलम कोठारी का नाम सुनकर 1980 के दशक की वे फिल्में याद आती हैं जिनमें वे गोविंदा और चंकी पांडे के साथ क़दम से क़दम मिलाकर नाचा करती थीं.
मगर इन दिनों नीलम फिल्मी दुनिया की चमक से दूर एक दूसरी जगमगाती दुनिया बसा रही हैं.
नीलम ने 'नीलम ज्वेल्स' के नाम से जेवरात का कलेक्शन शुरू किया है और मुंबई में एक शोरूम भी खोला है.
पाँच साल इस क्षेत्र में बिताने के बाद नीलम अब भारत के बाहर अपने पाँव जमाना चाहती हैं.
इसी सिलसिले में नीलम ने हाल में दुबई में अपने जेवरात की एक प्रदर्शनी आयोजित की जिसे काफ़ी सराहा गया.
इस अवसर पर नीलम ने कहा, "मेरा परिवार कई सालों से जेवरात की कटाई और डिज़ाइनिंग से जुड़ा रहा है. हम लोग फेड लीटन और सेलीनी के ज़रिए सॉथबी और क्रिस्टी के शोरूम तक अपने जेवरात पहुँचाते हैं."
नीलम मुगल और विक्टोरियन दौर के जेवरात से प्रभावित हैं और अपने कलेक्शन में रूबी और एमेराल्ड जैसे पत्थरों का इस्तेमाल अधिक करती हैं.
उनका ध्यान इस बात पर होता है कि जेवरात अधिक आधुनिक न हों और इनको किसी काल से न जोड़ा जा सके.
नीलम का कहना है, "मैंने व्यवसायिक रूप से ङिज़ाइनिंग पाँच साल पहले शुरू की मगर दोस्तों के लिए मैं यह काम दस साल से कर रही हूँ लेकिन मैंने अपनी डिज़ाइन की हुई ज्वेलरी अपनी फिल्मों में या टीवी शो में कभी नही पहना."
वे कहती हैं कि आजकल उनका सारा समय जेवरात की ङिज़ाइनिंग और शोरूम में जाता है और अब चूँकि कोई फिल्मों या टीवी शो नहीं कर रही इसलिए अब यह इनका पेशा बन गया है.
नीलम को दुबई की ने बहुत उत्साहित किया है और वे यहाँ रह रहे अलग-अलग देश के लोगों से संपर्क बनाए रखना चाहती हैं.
उनकी प्रदर्शनी में मौजूद लोगों को जेवरात पसंद तो आए मगर ज़्यादातर लोगों को लगा कि महँगे हैं.
प्रदर्शनी में आईं उज़्मा शेख़ को जेवरात से अधिक नीलम को देखने की ख्वाहिश थी, उन्होंने कहा, "मैं नीलम की फिल्में बहुत शौक़ से देखती थी, जेवरात तो मेरे बजट के बाहर हैं मगर नीलम से मिलकर मज़ा आया, वह काफी हँसमुख और खूबसूरत हैं।"
नीलम के लिए दुबई एक पड़ाव है, वह अब अपनी इस कला को और आगे ले जाना चाहती हैं.