शुक्रवार, 12 नवंबर, 2004 को 04:24 GMT तक के समाचार
प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता से
दस नवंबर से शुरू हुए दसवें कोलकाता फिल्मोत्सव में आपका स्वागत है.
नेमप्लेट से लेकर पोस्टर, बैनर तक तमाम चीजें बांग्ला में हैं. लेकिन बांग्ला भाषा की कोई समकालीन फिल्म यहाँ नहीं है.
पश्चिम बंगाल में ऋतुपर्णो घोष, गौतम घोष और बुद्धदेव दासगुप्ता सरीखे निर्माता-निर्देशक बांग्ला में लगातार बेहतरीन फिल्में बना रहे हैं और कान से लेकर वेनिस तक तमाम विदेशी फिल्मोत्सवों में वाहवाही लूट रहे हैं लेकिन यहाँ उनकी कोई भी नई फिल्म दर्शकों को देखने को नहीं मिलेगी.
इस फिल्मोत्सव के लिए राज्य के सुदूर कूचबिहार जिले से आए अंशुमान भट्टाचार्य कहते हैं कि “किसी समकालीन बांग्ला फिल्म को सूची में नहीं देख कर निराशा हुई है.”
उनकी तरह निराश होने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है. महोत्सव के दौरान दिखाई जाने वाली 45 देशों की कुल 139 फिल्मों में से भारत के बाकी राज्यों की कुल पाँच फिल्में ही दिखाई जाएँगी.
महोत्सव के दौरान किसी समकालीन बांग्ला फिल्म का प्रदर्शन नहीं होने की सूचना से मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी अचरज में हैं, वे राज्य के सूचना एवं संस्कृति मंत्री भी हैं.
समस्याएँ
उन्होंने आयोजकों से कम से कम एक नई बांग्ला फिल्म के प्रदर्शन की व्यवस्था करने को कहा है.
वैसे सत्यजित राय की ‘पथेर पांचाली’ महोत्सव के दौरान दिखाई जाएगी. इसकी वजह यह है कि यह फिल्म का स्वर्ण जयंती वर्ष है.
इसमें आखिर महज पाँच भारतीय फिल्में ही क्यों शामिल की गई हैं? आयोजकों की दलील है कि उनको इतनी ही फिल्में मिलीं.
श्रद्धांजलि खंड में ब्रिटेन के निर्देशक पीटर ग्रीनवे की चार फिल्में दिखाई जाएँगी.
महोत्सव का उदघाटन चिली के मशहूर निर्देशक मार्सेलो फेरारी की फिल्म ‘सब टेरा’ से होगा.
मार्केटिंग
बांग्ला फिल्म उद्योग से जुड़े लोग बताते हैं कि इस महोत्सव से निर्माताओं के दूर रहने की एक प्रमुख वजह यह है कि यहाँ फिल्मों के मार्केटिंग की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है.
लिहाजा अपनी फिल्में यहाँ भेजने से उनको कोई फायदा नहीं होता. बीते साल हालाँकि आयोजकों ने मार्केटिंग पर जोर देने का फैसला किया गया था. लेकिन अब तक इस बारे में कोई ठोस नीति नहीं बनाई जा सकी है.
लंदन, सिडनी, वियना, मेलबोर्न और टोरंटो फिल्मोत्सवों में फिल्मों की मार्केटिंग पर खास ध्यान दिया जाता है लेकिन कोलकाता में धन की कमी से अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है.
फिल्मोत्सव समिति के अध्यक्ष और जाने-माने बांग्ला फ़िल्म अभिनेता सौमित्र चटर्जी की दलील है कि विदेशी फिल्मोत्सवों के मुकाबले इस फिल्मोत्सव का बजट ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है.
इस बार महोत्सव का बजट बढ़ाकर डेढ़ करोड़ कर दिया गया हैं लेकिन इसमें से सरकार ने महज तीस लाख दिए हैं बाकी रकम औद्योगिक घरानों की सहायता से जुटाई गई है.