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सोमवार, 04 अक्तूबर, 2004 को 04:16 GMT तक के समाचार

आकाश सोनी
बीबीसी संवाददाता

गोंड कला की छाप सात समंदर पार भी

आइए आपकी मुलाक़ात कराते हैं एक ऐसे आदिवासी गोंड कलाकार से जिसने भारत के एक छोटे से इलाक़े से निकलकर अपनी कला की छाप सात समंदर पार भी छोड़ी है.

ये हैं भज्जू श्याम जो मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास एक गाँव पाटनगढ़ के रहने वाले हैं.

भज्जू गोंड क़बीले की शैली में भित्ती चित्र बनाते हैं. भज्जू श्याम का काम लंदन में काफ़ी सराहा गया है.

लंदन के एक मशहूर रेस्तराँ 'मसाला ज़ोन' में भारतीय भोजन और भारतीय संगीत के साथ भज्जू श्याम की कला के नमूने भी परोसे जाते हैं.

मसाला ज़ोन रेस्तराँ के मालिक को भज्जू श्याम की कूची के रंग इतने पसंद आए कि उन्होंने श्याम को रेस्तराँ की दीवारों पर भित्ती चित्र बनाने के लिए लंदन बुला भेजा.

मसाला ज़ोन ने भज्जू को दो महीने लंदन में ठहराया और लगभग 60,000 रुपए भी दिए.

पहचान

भज्जू श्याम की कला शैली की ख़ास बात है उनका अनोखा दृष्टिकोण जो उनके चित्रों में साफ़ नज़र आता है.

मसलन, भज्जू ने देखा कि लंदन में किस तरह लोग वक़्त के पाबंद हैं, “यहाँ पाँच मिनट पहले पहुँच जाओ तो बोला जाएगा - बैठ जाइए समय पर ही मिलेंगे, और अगर पाँच मिनट देर से पहुँचें तो सुनने को मिलेगा - आपको देर हो गई, थोड़ी देर बैठकर इंतज़ार कीजिए.”

भज्जू श्याम लंदन की विश्व प्रसिद्ध घड़ी बिग बेन को समय का मंदिर बताते हुए कहते हैं, “हमारे गाँव में समय का पता मुर्ग़े की बाँग से मिलता है. उसी तरह लंदन में बिग बेन घड़ी है जो यहाँ के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. शायद यह इनके लिए समय का मंदिर है.”

इसीलिए अपने एक चित्र में भज्जू ने बनाया है एक ऐसा मुर्ग़ा जिसकी गर्दन ठहरती है बिग बेन की ऊँचाई पर.

भज्जू श्याम लंदन के लोगों की तुलना चमगादड़ से करते हैं और इसके पीछे उनकी ख़ास दलील है.

"भारत में आदमी दिन में घूमते-फिरते हैं, लंदन में लोग रात को निकलते हैं. अँग्रेज़ दिन में काम करते हैं इसलिए सड़कों पर लोग कम ही नज़र आते हैं."

"लेकिन रात होते ही ये लोग ज़मीन के नीचे चलने वाली ट्रेनों से सफ़र करते हुए निकलते हैं, चमगादड़ों की तरह. चमगादड़ को तलाश होती है फल की, इन लोगों को तलाश होती है शराब की. और फिर रात भर हँसते-खेलते मस्ती करते हैं.”

लेकिन लंदन के मसाला ज़ोन रेस्तराँ के लोग भज्जू श्याम के चित्रों के बारे में क्या कहते हैं?

तुलना

यूरोप में लोग ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी कला को तो समझते हैं लेकिन भारतीय आदिवासी कला को कम ही लोग समझते हैं.

मसलन, ब्रिटेन के लिवरपूल शहर के बॉब कॉनोली कहते हैं, “मैंने ऑस्ट्रेलिया की कला देखी है और ये चित्र मुझे वैसे ही लगते हैं. आम तौर पर देखी जाने वाली भारतीय कलाकृतियों की तरह ये चित्र नहीं लगते.”

दूसरी तरफ़ ऑस्ट्रेलिया के टॉम सिंगर का कहना था, “मुझे ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी कला की समझ है इसीलिए मैं इन पेंटिंग को भी समझ पाता हूँ. इसमें कुत्ते हैं, पक्षी हैं, पेड़-पौधे हैं, ये सब बड़ा सुंदर लग रहा है.”

स्वीडन की डेनीज़ हेगस्ट्रोम को पसंद आए हैं भित्ती चित्रों के चटख रंग, “मुझे ये काम पसंद आया, मुझे रेस्तराँ में भारतीय भोजन अच्छा लगता है और यहाँ जब रंग बिरंगे चित्र देखती हूँ तो मेरा दिल खिल उठता है.”

इन बातों पर अपने सीधे सरल तरीके से भज्जू श्याम का कहना है कि उन्हें सिर्फ़ इस बात की खुशी है कि मध्यप्रदेश की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा लंदन में लोगों को पसंद आ रही है…और भज्जू के चित्रों और अनुभवों पर आधारित एक किताब जल्द ही दुनिया भर में प्रकाशित की जा रही.