शनिवार, 18 सितंबर, 2004 को 17:11 GMT तक के समाचार
रेडियो की बात आते ही जो पहला नाम ज़हन में आता है वो है अमीन सायानी का. हर उदघोषक के रोल मॉडल सायानी अब मुंबई के एक एफ़एम स्टेशन पर एक कार्यक्रम पेश करते हैं.
जयश्री बजोरिया के साथ बातचीत में उन्होंने कुछ पुरानी यादें ताज़ा कीं, और कुछ नए ज़माने के रेडियो के बारे में चर्चा की.
आपने रेडियो प्रसारण की शुरूआत कैसे की?
मैंने जब शुरूआत की रेडियो में तब तो मैं सात साल का था मगर उस ज़माने में मैं सिर्फ़ अँग्रेजी बोला करता था. अंग्रेजी में ब्रॉडकास्टिंग किया करता था और पढ़ाई मैंने गुजराती में की थी. मैं और बड़े अजीबोगरीब तरीके से रेडियो सीलोन से जुड़ गया, एक बार एक प्रोग्राम था जिसमें एनाउंसर नहीं आया था और मुझसे कहा गया कि अगर हो सके तो तुम कर दो. मैंने किसी तरह लिखा हुआ स्क्रिप्ट पढ़ दिया, उनको अच्छा लगा. मैंने पूछा मुझे पैसे कितने मिलेंगे? कहने लगे पैसा-वैसा तुम्हे कोई नहीं देगा, तुम्हें एक टीन ओवलटीन का मिलेगा हर हफ्ते. और इस तरह मैंने काम शुरू किया.
क्या कारण है कि बिनाका गीतमाला इतना लोकप्रिय हुआ?
उसकी लोकप्रियता की एक वजह तो ये थी कि जिस ज़माने में ऑल इंडिया रेडियो पर फिल्मी गाने बंद हुए थे, उस ज़माने में हिंदुस्तानी फिल्मी गानों का गोल्डन पीरियड चल रहा था. हिटपरेड का जो फार्मेट था वो कभी एसिया में किसी ने कहीं पहले सुना नहीं था, तो धूम मच गई और फिर लोग शर्तें लगाने लगे कि कौन सा गाना नंबर एक पर आएगा.
आपने कई महान हस्तियों के इंटरव्यू भी किए, उनके बारे में कोई यादगार क़िस्सा सुनाएँ.
आप मुंबई में कुछ एफएम स्टेशनों के साथ भी काम करते हैं तो आजकल के एनाउंसरों के बारे में आपकी क्या राय है?
आजकल के बहुत सारे एनाउंसर्स जो एफएम में हैं, वो सब एक ही तरह साउंड करते हैं. वो बदलना चाहिए. एक एनाउंसर अगर बोल रहा है तो उसकी पर्सनैलिटी हमारे आँखों के सामने आ जानी चाहिए.
आपसे बड़ी पर्सनैलिटी तो रेडियो के इतिहास में कम ही हैं. एक दौर था जब सभी अमीन सायानी की तरह ही बोलना चाहते थे.
एक बात बताऊँ मैं कि वहाँ लंदन में एक रेडियो स्टेशन बहुत अच्छा है- सनराइज रेडियो. मैं लंदन गया था तो मेरे पुराने क्लाइंट ने कहा कि वो मेरा इंटरव्यू करना चाहते हैं तो मैं जा रहा था उसके लिए गाड़ी में तो मैंने रास्ते में वो रेडियो स्टेशन सुना और मुझे लगा कि कहीं उस पर मैं तो नहीं बोल रहा. फिर वहाँ जब मैं पहुँचा तो ये पता लगा कि ये एनाउंसर जो थे, बड़े काबिल आदमी थे, लेकिन वो बोल रहे थे अमीन सायानी अंदाज़ में.
अपने दो ऑलटाइम फेवरेट गाने बताइए
एक डांस का गीत था- वहीदा जिस पर नाची थीं, गोल्डी विजय आनंद ने डायरेक्शन की थी, गाइड का गाना था, बर्मन दादा का संगीत था- पिया तोसे नैना लागे रे।
मैं सात साल की उम्र से बोलता रहा हूँ तो कभी-कभी जी चाहता है कि बोलना बंद ही कर दूँ. कुछ बातें बिना बोले भी हो जाती हैं. एक शेर बहुत ही खूबसूरत है-
कुछ उनकी नज़र ने उठकर कहा, कुछ मेरी नज़र ने झुक कर कहा,
झगड़ा जो न बनता बरसों में, तय हो गया बातों-बातों में.
इसीलिए एक गाना मुझे बहुत पसंद है- 1942- ए लव स्टोरी का- कुछ न कहो, कुछ भी न कहो.