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सोमवार, 13 सितंबर, 2004 को 17:05 GMT तक के समाचार

'कर्मकाँड जैसा है हिंदी दिवस'

हिंदी दिवस के आयोजनों के न्योते और सरकारी संस्थानों के बाहर टंगे हिंदी पखवाड़े के बैनरों के भरोसे हिंदी की सेवा सरकार हर साल करती है.

पर क्या हिंदी की भाष्य-गंगा के लिए ऐसे आयोजन भागीरथी बन पा रहे हैं या ये सारा तामझाम हाथी का दाँत भर हैं?

क्या है हिंदी दिवस के आयोजनों की सार्थकता? इस बारे में वरिष्ठ साहित्यकार व 'हंस' पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव से पाणिनि आनंद ने बातचीत की. आइए पढ़ते हैं बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

सरकारी आयोजन

हिंदी की याद लोगों को सिर्फ़ हिंदी दिवस या इस दौरान होने वाले कार्यक्रमों में ही आती है, बाकी 364 दिन लोग हिंदी को भूले रहते हैं और इस बारे में बात भी नहीं करते हैं.

यह हिंदी दिवस सरकारी और अर्द्धसरकारी विभागों में कार्यरत हिंदी अधिकारियों के लिए ही है.

वही लोग आपस में अपनी सार्थकता सिद्ध करने के लिए या ये बताने के लिए कि वो कितने महत्वपूर्ण हैं, इस तरह का आयोजन करते हैं.

आपस में ही इकट्ठा हो जाते हैं. साल भर हिंदी पर कोई काम हो या न हो, यह आयोजन ज़रूर हो जाता है.

यह दुर्भाग्य है कि यह सरकारी आयोजन भर हो गया है और हमारे यहाँ अजीब स्थिति यह है कि जो कुछ भी सरकारी है, वो किसी का नहीं है, वो सार्वजनिक है.

सार्वजनिक किसी का नहीं होता, चाहे वो सरकारी आयोजन हो, योजना हो और या फिर किसी भी तरह का सरकारी मामला हो, वो किसी का नहीं है. लोगों में उसके प्रति एक ख़ास तरह की उदासीनता आ जाती है और वैसी ही उदासीनता और प्रतिरोध जैसी भावना हिंदी के लिए भी दिखाई देती है.

हवाई हिंदी-सेवा

राजभाषा अधिकारी साल भर जिस तरह की नकली और झूठी भाषा तैयार करते रहते हैं, उसे शायद कोई नहीं पढ़ता.

मेरे यहाँ भी कोई 15-20 ऐसी पत्रिकाएँ आती हैं जो मोटे आर्टपेपर पर छपी होती हैं. इन सजी-मजी ख़ूबसूरत पत्रिकाओं में इनके कुछ अधिकारियों की तस्वीरें छपी होती हैं.

कोई भाषण दे रहा है, कोई कार्यक्रम कर रहा है तो कोई पुरस्कार बाँट रहा है, यही सब छपा होता है और इससे लगता है कि शायद यह एक अलग दुनिया है और इससे हमारा कोई मतलब नहीं है.

मुझे तो इसकी कोई ख़ास सार्थकता समझ में नहीं आती. जैसे 15 अगस्त को झंडा फहरा लेते हैं, दो अक्टूबर को राजघाट जाकर फूल चढ़ाते हैं, उसी तरह का यह भी एक आयोजन है.

एक ज़माना था जब हम आगरा से 15 अगस्त पर दिल्ली आते थे. अब वो बात नहीं रही. आपने देखा होगा, जिस तरह अब राष्ट्रीय पर्वों के आयोजनों में जनता की कोई शिरकत नहीं होती, बस नेता, मंत्री और स्कूलों से लाए गए बच्चे होते हैं, वैसे ही अब सरकारी हिंदी दिवसों के आयोजनों में भी हो रहा है.

कितने सार्थक हैं प्रयास

मुझे तो यह एक कर्मकाँड भर लगता है जिसको हम करते रहते हैं. उपयोगिता इसकी कुछ भी नहीं रही.

इससे तो भाषा का भी भला नहीं होने वाला क्योंकि उसके लिए भी ये कुछ नहीं करते. कम से कम यही करते कि अपने अपने उपक्रमों-संस्थानों का एक शब्दकोश ही तैयार कर लें.

अगर शब्दकोश बनाते भी हैं तो संस्कृत के या उलटे-सीधे अप्रचलित शब्दों को बटोर कर. जो रघुबीर का काम रखा हुआ है उसी में से कुछ चीजें उठा लेते हैं जो किसी को समझ में नहीं आते, जिनका कोई उपयोग तक नहीं करता. और तो और, वो खुद भी नहीं करते.

ये चाहें तो अपने को और इस आयोजन को उपयोगी बना सकते हैं पर वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि सबको कमरों में बंद होकर काम करना है, और दुर्भाग्य से ये सारे के सारे लेखक हैं जिन्हें सारी सुविधाएँ हैं लिखने की.

अपने पद और विज्ञापनों की सौदेबाजी के सहारे ऐसे लोगों की रचनाएँ छप भी जाती हैं. पर नतीजा क्या है, आम लोगों को ऐसी भाषा और साहित्य से विरक्ति होती जा रही है.

आज की हिंदी

मैं मानता हूँ कि जो जीवंत हिंदी है, वो आज से नहीं, सैकड़ों सालों से बाज़ार में बनी हुई है.

परिवारों में, लोगों में और समाज में हिंदी का बाज़ार तमाम चुनौतियों के बावजूद हिंदी को जीवित और जीवंत बनाए हुए है.

मीडिया और फ़िल्मों का इसमें बड़ा योगदान है.

हिंदी का एक नया रूप उभर कर सामने आ रहा है. हम इससे सहमत हों, न हों. ये हमारे गले उतरे, न उतरे. जो चाहे हो पर सच सही है कि हिंदी बदल रही है और यही उसके जीवित रहने की निशानी है.

भाषा में निरंतर परिवर्तन हो रहा है और होते रहना चाहिए. किसी भी भाषा को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी होता है.