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बुधवार, 11 अगस्त, 2004 को 14:43 GMT तक के समाचार

अतुल प्रभाकर
दिल्ली से

कैंसर अस्पताल बनवाने का सपना

अपनी पहली ही फ़िल्म 'कंपनी' से अपनी पहचान बनाने और एवार्ड जीतने वाले विवेक ओबरॉय ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है.

अपनी नई फ़िल्म 'क्यूँ हो गया न...' के प्रचार के लिए वे पिछले दिनों दिल्ली आए तो उन्होंने बड़ी बेबाकी और साफ़गोई से बातचीत की.

वे कहते हैं, "मेरा सबसे बड़ा सपना कोई प्रतिष्ठित फ़िल्मी पुरस्कार या कोई ज़ोरदा किरदार निभाने का नहीं है बल्कि अपनी माँ यशोधरा ओबरॉय के नाम पर बने फाउंडेशन के तहत एक कैंसर अस्पताल बनवाना है. जहाँ ग़रीबों और निचले तबके के लोगों का मुफ्त इलाज हो सके."

अभी तक विवेक ने हर बार अलग-अलग तरह के किरदार निभाए हैं चाहे वो 'कंपनी' का चंदू हो या उनकी रिलीज़ होने वाली फ़िल्म 'क्यूँ हो गया न...' का अर्जुन.

वे मानते हैं कि 'क्यूँ हो गया न...' के लिए उन्हें उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ी जितनी 'कंपनी' या 'साथिया' के लिए.

क्योंकि उन फ़िल्मों में अपने किरदार को और बेहतर समझने के लिए मुंबई की चालों और बदनाम गलियों में भी जाना पड़ा.

क्यूँ हो गया न...

'क्यूँ हो गया ना...' में वो पहली बार ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन के साथ हैं.

विवेक दोनों की बहुत तारीफ़ करते हैं, "अमिताभ बच्चन मेरे लिए देवता समान हैं और ऐश्वर्या की जुबान से ज़्यादा आँखे बोलती हैं. वे एक बेहतरीन अदाकारा हैं."

निर्देशक विशाल भारद्वाज की "टिम्बकटू और इंद्र कुमार की एक फ़िल्म में विवेक-ऐश्वर्या की जोड़ी एक बार फिर दिखाई देगी.

नियम से पूजा-पाठ करने वाले विवेक ओबरॉय ईश्वर का हर बात के लिए शुक्रिया अदा करते हैं.

मशहूर अभिनेता और अपने पिता सुरेश ओबराए से वो पटकथा और फ़िल्मों के चुनाव पर ज़्यादा बातचीत नहीं करते.

वे कहते हैं, "मैं अपने फैसले खुद ही करता हूँ और इसमें किसी का दख़ल नहीं रहता."

आज फ़िल्म इंडस्ट्री में सिर्फ सेक्स और शाहरूख ख़ान ही बिकता है, के सवाल पर उनका मानना है कि "ये सोचना निर्देशक का काम है कि वो क्या परोसता है, जबकि जनता जानती है कि उसे क्या देखना है. वैसे कॉमेडी भी चल रही है और लवस्टोरी भी."

सामाजिक सरोकार

ग़रीबों के लिए कैंसर अस्पताल बनाने के अलावा वे और भी सामाजिक कार्य करना चाहते हैं और कर रहे हैं.

लोगों से मिले प्यार और सम्मान को वापस लौटाने में यकीन करने वाले विवेक ओबरॉय मानसिक और शारीरिक तौर पर बीमार अकेली औरतों और बच्चों की सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं.

तम्बाकू विरोधी अभियान से भी वो जुड़े हैं और कहते हैं "रीयल-लाइफ में मैं सिगरेट नहीं पीता. लेकिन जब तक बेहद ज़रूरी न हो रील-लाइफ में भी सिगरेट नहीं जलाता."

अपनी आने वाली फ़िल्म 'किसना' और वेनिस फ़िल्म समारोह में दिखाई जाने वाली 'युवा' को लेकर वो ख़ासे खुश दिखे.

विवेक ओबरॉय ने जिस तरह से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के बावजूद बहुत अधिक फ़िल्में साइन नहीं की हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि "कला के साथ कमाई" का उनका मंत्र काम कर रहा है.