बुधवार, 16 जून, 2004 को 00:19 GMT तक के समाचार
प्रीति ज़िंटा की क़लम से
कार्ल मार्क्स का कहना था धर्म जनता के लिए अफ़ीम है.
लेकिन भारत में तो फ़िल्में लोगों के लिए धर्म के समान हैं.
और यदि देवताओं की प्रतिस्पर्द्धा में कोई है तो वे हैं अभिनेता या फिर क्रिकेटर.
मैने फ़िल्मों और अभिनेताओं के प्रभाव को जिंदगी में बहुत जल्द ही देख लिया था.
भारत में 1980 के दशक में 'रामायण' सीरियल टीवी पर चल रहा था.
हर रविवार को हमारे फ़ार्म पर आसपास के गाँवों से सुबह-सुबह लोग आने शुरु हो जाते थे.
ठीक साढ़े आठ बजे लोगो आने शुरु हो जाते, मेरे दादा-दादी को प्रणाम कर, जूते उतार कर टीवी के सामने सर झुकाते और बैठ जाते जैसे कि टीवी कोई देवी-देवता हो.
और नौ बजे पूरी शांति में उनकी नज़रे टीवी की ओर गढ़ जातीं, जब वे 'भगवान' के दर्शन करते.
'ईश-निंदा'
एक दिन मैने अपने परिवार के कुछ दोस्तों को मेरे दादा-दादी से ये कहते सुना कि सीरियल में जो अभिनेत्री 'सीता' बनी हैं, उन्होंने बीयर ख़रीद कर भारतीय लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाई.
उनके लिए 'सीता' कुछ भी ग़लत नहीं कर सकती थीं.
ऐसी पूजनीय हस्ती कैसे शराब ख़रीदने जा सकती थीं? ये तो ईश-निंदा हुई.
फ़िल्म जगत में छह साल और 17 फ़िल्में करने के बाद मुझे ये समझ आ रहा है कि भारत में फ़िल्म अभिनेत्री होने का क्या मतलब है.
ये संसार में सबसे मुश्किल काम है, कछ पागल कर देने वाला काम है और कई बार तो डरा देने वाला काम है.
'फ़ैन' कई तरह के होते हैं और अपने पसंदीदा स्टार के पास आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. हमारे नाम पर मंदिर बनाए जाते हैं. हमारे ईमेल बॉक्स उनकी मेल से भरे रहते हैं और फिर उनका प्यार बिना किसी शर्त के होता है.
कई बार तो ये प्यार और प्रशंसा आपको बहुत ही विनम्र बना देता और आप भगवान के बहुत नज़दीक महसूस करते हैं.
हाल में मैं एक ऐसी लड़की से मिली जो रक्त के कैंसर से ग्रस्त थी और उसने मुझसे मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी.
मुझे मानना पड़ेगा कि मैं जब अस्पताल पहुँची तो बहुत विचलित थी.
मैं क्या कहूँ? मैं ऐसा क्या कहूँ कि उसे बेहतर महसूस हो? मैं ये सब सोच ही रही थी कि मैने देखा कि उसकी मुस्कुराहट से उसका चेहरा खिल उठा.
दो हफ़्ते बाद उसका देहांत हो गया लेकिन उसकी खिली हुई मुस्कुराहट की याद सदा मेरे दिल में रहती है.
हे भगवान! मैं तुम्हारा शुक्रिया कैसा अदा करुँ कि तुमने मुझे अपने इतना नज़दीक महसूस करने का मौक़ा दिया? मैं तुम्हारा धन्यवाद करती हूँ कि मैं किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकी.
अपने चाहते वालों के साथ कई बार अजीब मुलाकात भी होती है.
एक बार एक पति-पत्नी मेरे पास आए और कहने लगे कि उनका बच्चा मेरा बहुत बड़ा 'फ़ैन' है लेकिन मैने बाद में पाया कि उनका बच्चा तो 11 महीने का है और वह तो शायद अपने माता-पिता को भी नहीं पहचानता होगा.
लेकिन हँसते हुए मैने उस परिवार के साथ फ़ोटो खिंचवाई.
दूसरा पहलू
भारत में अभिनेताओं का लोगों पर बहुत प्रभाव है और पल भर में वे भीड़ जमा कर सकते हैं.
हाल में कुछ अभिनेताओं ने चुनाव लड़ने की कोशिश की.
ये देखकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि वे सब जीत गए. आश्चर्य इस बात से हुआ कि जनता केवल उनकी फ़िल्मों से उनके 'डायलॉग' ही सुनना चाहती थी. ये है भारत में अभिनेताओं का प्रभाव.
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है.
रात के दो बजे फ़ोन का बजना, बुरे मैसम में शूटिंग करना और अपना ख़ून-पसीना एक करके काम करना.
एक अजीब सी असुरक्षा की भावना रहती है और असफलता का डर भी.
कामयाबी से संतुष्टि भी मिलती है लेकिन ये भी एक अकेलेपन के साए में होती है. ये सब 'शोबिज़' का हिस्सा है.
हमेशा ही अपनी उस छवि के साथ मुकाबला रहता है जो वास्तविकता से कहीं बड़ी होती है.
मुझे याद है कि शाहरुख़ ख़ान के साथ 'कल हो न हो' के लिए न्यूयॉर्क में शूटिंग करते हुए एक अजीब घटना हुई.
एक बहुत ही मोटी महिला शाहरुख़ के पास आईं और बोलीं, "हे भगवान! शाहरुख़ तुम कितने दुबले हो?" लेकिन पलक झपकने से पहले, शाहरुख़ बोले, "हे भगवान! आप कितनी मोटी हैं?"
मुझे बहुत हँसी आई लेकिन मैं समझ सकती थी कि वे क्या दर्द महसूस कर रहे हैं.
जिस सर पर ताज होता है वह कुछ मुश्किल में तो होता है. इसीलिए अपना संतुलन बनाए रखना बहुत ज़रूरी होता है. इसीलिए मैं अच्छा और बुरे से विचलित नहीं होती और ख़ुद को कहती रहती हूँ, "फ़िल्में मेरी ज़िंदगी का हिस्सा हैं. मैं फ़िल्मों में अभिनय करती हूँ लेकिन उनके नीचे दब नहीं गई हूँ. "
आज मैं केवल इतना कह सकती हूँ, "हे भगवान, मैने जिसकी कल्पना भी नहीं की थी, वह भी मुझे देने के लिए धन्यवाद."