http://www.bbcchindi.com

मंगलवार, 01 जून, 2004 को 20:30 GMT तक के समाचार

महबूब ख़ान
बीबीसी हिंदी

भारत बँटवारे का दर्द पर्दे पर

शहर में आदमी कोई भी नहीं क़त्ल हुआ,
नाम थे लोगों के जो क़त्ल हुए,
सर नहीं काटा किसी ने भी कहीं पर कोई,
लोगों ने टोपियाँ काटी थीं, कि जिनमें सर थे,
और ये बहता हुआ सुर्ख़ लहू है,
जो सड़क पर सिर्फ़ आवाज़ें ज़िबह करते हुए गिरा था.

ये है गुलज़ार की एक नज़्म जो 1947 में भारत के बँटवारे के दर्द को उकेरती है.

भारत के बँटवारे के बाद हिंदू और मुसलमानों के आपसी भरोसे के तार इस हद बिखर गए कि उन्हें जोड़ना अनहोनी घटना जैसा लगता रहा है.

देखिए बँटवारे पर बनी फ़िल्मों की कुछ झलकियाँ

बँटवारे ने सिर्फ़ दुनिया के नक्शे पर ही लकीर नहीं खींची बल्कि इंसानियत को ही बाँटकर रख दिया. पीढ़ियों से साथ रहते आए पड़ोसियों के बीच शक की ऐसी दीवार खड़ी कर दी जिसने पूरी फ़िज़ा में ही कड़वाहट घोल दी.

बँटवारे का दर्द साहित्य में तो काफ़ी हद तक उभरा है लेकिन फ़िल्मी दुनिया में इस विषय ने उतनी जगह नहीं बनाई जितनी कि उम्मीद की जाती थी.

लंदन से छपने वाली एक पत्रिका साउथ एशियन सिनेमा ने अपने ताज़ा अंक में इस विषय पर बहस छेड़ी है जिसमें ये जानने की कोशिश की गई है कि फ़िल्मकारों ने आख़िर क्यों, इस विषय को छूने की हिम्मत नहीं की.

साउथ एशियन सिनेमा के संपादक ललित मोहन जोशी कहते हैं कि इस अंक में उन लगभग सभी फिल्मकारों के इंटरव्यू और संस्मरण हैं जो बँटवारे पर बनी छिन्नमूल, चित्रा नोदिर पारे, गर्म हवा, तमस, ख़ामोश पानी वग़ैरा से जुड़े रहे हैं. उन्होंने एक बार फिर पलटकर उन फ़िल्मों की तरफ़ देखा है.

"इस अंक का उद्देश्य यही था कि इतनी बड़ी घटना के बारे में इतिहास और साहित्य के बारे में तो ख़ूब लिखा गया लेकिन फ़िल्मों ने इस बारे में क्या किया."

बँटवारा किसका?

पत्रिका में छपे एक इंटरव्यू में मशहूर फ़िल्मकार श्याम बेनेगल कहते हैं, "भारत में एक भावना थी कि देश का बँटवारा और पाकिस्तान का निर्माण मुसलमानों की वजह से ही हुआ, जबकि पाकिस्तान में यह सोच थी कि भारत के अड़ियल रवैए की वजह से ही पाकिस्तान बनाने की ज़रूरत पैदा हुई."

"भारत का बँटवारा किसी देश का बँटवारा नहीं था, दरअसल यह इंसानियत को बाँटने जैसा था – जैसे किसी शरीर के दो हिस्से कर दिए जाएँ."

श्याम बेनेगल के मुताबिक - चूँकि यह एक बहुत ही नाज़ुक मामला था इसलिए फ़िल्म जगत इस विषय को छूने से बचता रहा. लेकिन 1971 के बाद से जब माहौल कुछ सुधरा तो इस विषय को एक अलग नज़रिए से देखना शुरू किया गया.

ललित मोहन जोशी ने इस अंक में जो सामग्री जुटाई है उससे यह समझने में मदद मिलती है कि यह विषय आख़िर फ़िल्मों से क्यों अछूता रहा.

अब जब भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती का माहौल बनना शुरू हुआ है तो लोगों की उम्मीदें भी जगी हैं.

बहुत से फ़िल्मकारों का कहना है कि वे अब ऐसी फ़िल्में नहीं बनाएंगे जिनसे कड़वाहट बढ़े, बल्कि दोस्ती और प्यार का जो माहौल शुरू हो रहा है, फ़िल्मों से उस माहौल को मज़बूत करने में मदद मिलनी चाहिए.

ऐसे में साउथ एशियन सिनेमा नाम की पत्रिका ने भी इस बहस को बहुत सही वक़्त पर छेड़ा है कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों को फ़िल्मों में अब एक नए नज़रिए से देखने और पेश करने की ज़रूरत है.