दिल्ली के दिनों में दोस्तों के बीच बैठकर हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में काम पाने की योजनाएँ बनाना एक प्यारा शग़ल होता था.
तजुर्बेकार बताते थे कि मुंबई में कभी किसी से रोल के बारे में मत पूछना. रोल पूछते ही वे समझ जाते हैं कि आप थिएटर के हैं.
कॉमर्शियल फ़िल्मों में रोल क्या होता है? हीरो, हीरोईन, कैरेक्टर आर्टिस्ट, विलेन और कॉमेडियन की श्रेणियाँ होती हैं. इनमें से कोई एक आप हो सकते हैं.
कहा भी जाता है..विलेन का रोल मिला है, कॉमेडियन का रोल मिला है या हीरो बन गए हैं.
कैसी विडंबना रही है कि आप एक्टर हैं, मगर अपने रोल के बारे में नहीं पूछ सकते.
आप एक्टर हैं मगर यह नहीं बता सकते कि थिएटर से आए हैं. आप एक्टर हैं मगर फ़िल्म के बारे में कोई सवाल नहीं कर सकते.
सोचता हूँ कि क्या हमेशा ऐसी ही स्थिति रही होगी? क्या पहले कभी ऐसा भेद रखा जाता था कि यह एक्टर है और यह थिएटर से आया एक्टर है.
पृथ्वीराज कपूर से लेकर बलराज साहनी तक कई एक्टर थिएटर से आए थे. उन्हें तो कभी इस तरह से अलग कर नहीं देखा गया.
ग़ौर करें तो यह भेद आठवें दशक के आरंभ से आया. पहले एक ही तरह का सिनेमा होता था.
आठवें दशक में कुछ फ़िल्मकारों ने कम बजट में बग़ैर चमक-दमक के और सचमुच थिएटर से आए एक्टरों को लेकर फ़िल्में बनानी शुरू की. कारण महज इतना था कि थिएटर से आए एक्टर कम पैसों में काम करने के लिए राज़ी हो जाते थे.
मीडिया ने उनकी फ़िल्मों को 'आर्ट' फ़िल्मों की श्रेणी में रख दिया. एक आँदोलन सा चल निकला.
अपनी पहचान हासिल करने में कामयाब होने के बावजूद 'आर्ट' फ़िल्मों के फ़िल्मकार और कलाकार अलग-थलग पड़ गए. कॉमर्शियल फ़िल्मों के लोगों ने उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया.
मैं नसीरूद्दीन शाह की पीड़ा समझ सकता हूँ और उसका समर्थन करना चाहता हूँ. उन्होंने किसी इंटरव्यू में कहा था,"मैं भी पॉपुलर एक्टर होना चाहता था".ओमपुरी और दूसरे कई अभिनेताओं ने इस तरह की बातें कही हैं.
उनके लंबे संघर्ष और प्रयास के बाद थिएटर से आए सामान्य कद-काठी और चेहरे के अभिनेताओं के प्रति हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की मुख्यधारा का रवैया बदला.
मैंने पहले भी लिखा था कि नसीरूद्दीन शाह और ओमपुरी की मेहनत से उगी फसल को काटने का मौक़ा हमें मिला है. हमारी कामयाबी में उनका संघर्ष भी शामिल है.
पाँच-दस सालों के बाद फ़िल्मों के अध्येता हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में आए इस बदलाव का अध्ययन करेंगे. वे कारण और प्रभाव की खोज करेंगे तो मालूम होगा कि थिएटर से आए एक्टरों ने अनजाने ही कॉमर्शियल हिंदी फ़िल्मों के निर्देशकों और निर्माताओं की सोच बदल दी है.
यहाँ तक कि कमर्शियल फ़िल्मों ते पॉपुलर एक्टर भी 'बाइंड स्क्रिप्ट','रोल' और 'कैरेक्टर' की बातें करने लगे हैं.
हालाँकि ज़मीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है मगर बातचीत और बहसों में इन शब्दों का इस्तेमाल होने लगा है.
'बैंडिट क्वीन' और 'सत्या' दो ऐसी फ़िल्में हैं, जिन्होंने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर गुणात्मक प्रभाव डाला. इन दोनों फ़िल्मों से जुड़ी प्रतिभाएँ बाद में स्वतंत्र रूप से विकसित हुईं और अपने-अपने स्तर पर फ़िल्म इंडस्ट्री पर गुणात्मक प्रभाव डाला.
इन दोनों फ़िल्मों से जुड़ी प्रतिभाएँ बाद में स्वतंत्र रूप से विकसित हुईं और अपने-अपने स्तर पर फ़िल्म इंडस्ट्री के विकास में योगदान कर रही हैं. उनकी वजह से फ़िल्म इंडस्ट्री की परिधि से बाहर बसे लोगों के दिलों में भी महत्वाकांक्षाएँ पैदा हुई हैं.
आज ग़ैर फ़िल्मी परिवारों से आए अभिनेताओं और तकनीशियनों को महत्व दिया जा रहा है.
हालाँकि फ़िल्म संबंधी चर्चाओं का बड़ा हिस्सा कुछ लोकप्रिय हस्तियों तक सीमित रहता है मगर इन चर्चाओं के दरम्यान वैसे लोगों की भी सक्रियता बनी रहती है जिन पर मीडिया और दर्शकों का घ्यान नहीं जाता है.
उन पर भी 'स्पॉटलाइट' आएगा, ज़रूर आएगा, क्योंकि अब वे भी मंच पर मौजूद हैं.