टीवी से मेरा पहला साबका तब पड़ा था, जब मैं अपनी बड़ी दीदी से मिलने मुज़फ़्फ़रपुर गया था.
दीदी के पास काला और सफ़ेद टीवी था.
सन् 1983 में दिल्ली आने के बाद मैने पहली बार रंगीन टीवी देखा.
एक साल पहले दिल्ली में आयोजित एशियाड खेलों के मौके पर इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान टीवी रंगीन हुआ था.
एक दिन यूनिवर्सिटी में ख़बर फैली कि क्रिकेट के वर्ल्ड कप का प्रसारण किया जाएगा.
हम सभी दोस्त एक ऐसे दोस्त के घर जमा हुए, जिसके पास रंगीन टीवी था.
अपने चहेते क्रिकेट खिलाड़ियो को रंगीन कपड़ों में मैदान में देखकर बेहद ख़ुश हुआ था.
उसके पहले हम क्रिकेट मैचों का आँखों देखा हाल सिर्फ़ रेडियो पर सुनते थे.
तब से हमारे जीवन में टीवी का स्थान मज़बूत होता गया है.
क्या टीवी से सुकून आया?
समाचार और मनोरंजन का यह माध्यम अब स्थाई रूप से हमारी ज़िंदगी में आ चुका है.
अब इसे अपने जीवन से निकालना और हटाना तो दूर की बात, इसे कुछ घंटों तक 'ऑफ़' रखना भी असंभव होता जा रहा है.
टीवी पर चलती-फिरती तस्वीरों का नशा ऐसा चढ़ता है कि इसके 'ऑफ़' होते ही कुछ छूट जाने का ख़तरा होता है.
दुनिया भर की अच्छी-बुरी ख़बरें बस एक बटन दबाते ही हमारी आँखों के सामने नाचने लगती हैं.
लेकिन क्या इससे हमारी ज़िंदगी में सुकून आया है? मेरा जवाब होगा – नहीं आया है.
टीवी देखते हुए हम उत्तेजित और प्रभावित होते हैं.
इस उत्तेजना और प्रभाव की अप्रत्यक्ष मानसिक प्रतिक्रिया को हम समझ नहीं पाते. धीरे-धीरे हम टीवी से चिपक जाते हैं.
मनोरंजन, समाचार और ज्ञान देने में टीवी की भूमिका फ़िल्म, अख़बार और पुस्तकों से कम है.
सतही समाचार
यह एक ऐसा माध्यम है, जिसे पलटकर या दोबारा नहीं देखा जा सकता.
इसमें आँखों के सामने से जो एक बार निकल गया, वह कुछ बिंबों में थोड़ी देर के लिए दिमाग़ में टिकता हैं.
जैसे ही दूसेर दृश्य आँखों के सामने से गुज़रते हैं, वैसे ही पुराने बिंब धूमिल हो जाते हैं.
यही कारण है कि टीवी पर आई बड़ी से बड़ी ख़बर भी वैसी सूचना नहीं दे पाती, जो अख़बारों के ज़रिए मिलती है.
मुझे लगता है कि टीवी पर तात्कालिकता अधिक महत्वपूर्ण होती है.
सबसे पहले और तुरंत आने की होड़ में ख़बरों की सतह पर ही टीवी के कैमरे पैन होते हैं और टीवी रिपोर्टर समाचार की सतह ही दिखाते और बताते रहते हैं.
न तो ख़बरों की गहराई में वे हमें ले जाते हैं और न उसके आगे-पीछे के कारण और प्रभाव के बारे में बताते हैं.
छोटी ख़बरों तक में 'लाइव' या आँखों देखा हाल की सनसनी तो रहती है, पर अगले दिन तक उसका असर ग़ायब हो जाता है.
अभी तक टीवी ने कोई ऐसा उल्लेखनीय कवरेज नहीं किया है, जिससे हमारा सामाजिक या राजनीतिक जीवन प्रभावित हुआ हो.
मिस इंडिया प्रतियोगिता
हाल का उदाहरण ले.
मिस इंडिया प्रतियोगिता की एक विजेता लक्ष्मी पंडित से जुड़े मामले में टीवी ने उसे अपने कवरेज से विवादस्पद और चर्चित कर दिया, मगर नतीजा क्या हुआ?
क्या आम दर्शक जान पाए कि कि सौंदर्य प्रतियोगिताओं में ऐसी कथित गड़बड़ी कैसे संभव हुई?
पहले तो लक्ष्मी पंडित के शादीशुदा होने की बात उठी, फिर यह शोर हुआ कि उन्होंने अपनी उम्र ग़लत बताई.
मूल मुद्दा ही ग़ायब हो गया.
अगर कोई अनियमितता रही तो क्यों नहीं उसके विस्तार में जाकर पर्दाफाश किया गया?
दूसरी बात ये कि लक्ष्मी पंडित के प्रति टीवी रिपोर्टरो का रवैया अभद्र और बुरा रहा.
सवाल-जवाब और पूछताछ में फ़र्क़ है.
टीवी रिपोर्टर कई बार 'इंटरव्यू' करते-करते 'इंटेरोगेशन' पर उतर आते हैं.
हमें निर्णय लेना होगा कि क्या एक सभ्य समाज में यह उचित है?
टीवी की भूमिका और प्रभाव पर मीडिया विशेषज्ञ और समाज शास्त्रियों की बहस जारी है.
मेरी जिज्ञासा और प्रतिक्रिया महज़ इतनी है कि टीवी सनसनी फैलाने से न तो इस माध्यम का भला होगा और न दर्शकों का.
हम कलाकारों को आए दिन हँसी आती है.
बड़े अफ़सोस के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि टीवी पर रिपोर्टिंग की स्थिति नाज़ुक है और रिपोर्टर बेहद कमज़ोर है.
कुछ अपवाद हैं, मगर वे इस माध्यम के विकास के लिए काफ़ी नहीं हैं.