वहाँ न संगीत की धुन थी, न फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक. मौजूद थे तो संगीतकार ए.आर. रहमान, उनका संकल्प और उस संकल्प की गंभीरता.
और ये संकल्प था टीबी के ख़िलाफ़ दुनिया भर में अपने संगीत के ज़रिए जागरूकता पैदा करना.
हिंदी में अनुवाद करें तो संगठन का नाम होगा टीबी विरोधी बिरादरी!
इस बिरादरी ने ए.आर रहमान को टीबी-विरोधी अभियान का मुख्य संदेश-वाहक बनाया है.
टीबी, तपेदिक, राज्यक्षमा या क्षयरोग. नाम कुछ भी हो लेकिन दुनिया भर में इसके शिकारों की संख्या काफ़ी अधिक है. आँकड़े बताते हैं कि टीबी हर साल दुनिया भर में बीस लाख लोगों की जान ले लेती है.
रहमान ने टीबी के ख़िलाफ़ अपनी योजना का और ख़ुलासा किया.
उन्होंने कहा, "हम अलग अलग संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं. शायद हम दक्षिण अफ़्रीका, चीन, रूस या ब्राज़ील जैसे देशों तक संदेश पहुँचाने की कोशिश करेंगे.... लेकिन संगीत के ज़रिए."
तीन सौ से ज़्यादा संगठन
आयोजनकर्ताओं ने कहा कि 22 देशों में तीन सौ से ज़्यादा संगठन टीबी-विरोधी बिरादरी में शामिल हैं.
टीबी विरोधी बिरादरी के पॉल सॉमरफ़ेल्ड कहते हैं, "आज हम एक काफ़ी सकारात्मक नज़रिए से एक बहुत ही नकारात्मक विषय पर बात कर रहे हैं. टीबी अब भी एक बड़ी जानलेवा बीमारी है लेकिन इस बात की जानकारी ज़्यादा लोगों को नहीं हो पाती."
एक और संगठनकर्ता मार्कोस एस्पिनाल ने आंकड़े देकर बताया कि टीबी किस क़दर ख़तरनाक सूरत अख़्तियार कर चुकी है.
उनका कहना है, "लोग समझते हैं कि टीबी पर विजय पा ली गई है. हर साल दुनिया में 90 लाख लोगों को टीबी की बीमारी होती है और पाँच हज़ार लोग रोज़ाना इस बीमारी से मारे जाते हैं."
टीबी के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले संगठनों को उम्मीद है कि ए.आर रहमान के सहयोग से वो इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने में कामयाब होंगे.
आख़िर क्यों न हों...आसमानों को, छूने की आशा.... ए.आर. रहमान जो साथ हैं.