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'दराज़ों में बंद सपने'

वर्ष के अंत में बीबीसी हिंदी रेडियो पर एक नाटक प्रस्तुत करने की परंपरा बहुत पुरानी है.

इस वर्ष 'दराज़ों में बंद सपने' बीबीसी हिंदी की विशेष प्रस्तुति थी जिसका प्रसारण 25 और 26 दिसंबर को तीसरी सभा में हुआ.

अचला शर्मा का लिखा यह नाटक एक बड़े सामाजिक सवाल को उठाता है--क्या सपनों पर सिर्फ़ युवाओं और पुरूषों का अधिकार होता है? उस औरत के सपनों का क्या होता है जो पति की महत्वाकाँक्षाओं और बच्चों के पालन-पोषण में यह भूल जाती है कि उसने भी कभी एक ख़्वाब देखा था--कुछ करने का, कुछ बनने का.

क्या उसे आज अपना वो सपना साकार करने का अधिकार है?

'दराज़ों में बंद सपने' ऐसी औरतों की कहानी है जो इन सवालों से घिरी हुई हैं.

यह कहानी उम्र के उस पड़ाव की भी है जहाँ आकर नए दोस्त, नए रिश्ते बनाना मुश्किल हो जाता है और पुराने रिश्ते पीछे छूटने लगते हैं.

यह कहानी प्रेरणा, आकाँक्षा और प्रतिभा की है, उनके सपनों की है.

उनके जीवन की गुत्थियों को परत दर परत खोलने का एक रचनात्मक प्रयास है--'दराज़ों में बंद सपने.'

इस नाटक में बीबीसी हिंदी सेवा के कई नए-पुराने प्रसारकों ने हिस्सा लिया है जिनमें ममता गुप्ता, परवेज़ आलम, कृष्णकांत टंडन, राजेश जोशी और आकाश सोनी के नाम लिए जा सकते हैं.