शनिवार, 25 अक्तूबर, 2008 को 03:24 GMT तक के समाचार
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून ने कहा है कि विकासशील देशों को विश्व वित्तीय संकट से बचाने के लिए विशेष कदम उठाने की ज़रूरत है.
उनका कहना था कि विश्व के केंद्रीय बैंकों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को विकासशील देशों के बैंकों की मदद के लिए और आपात स्थिति का सामना करने के लिए कर्ज़ का प्रावधान करना पड़ सकता है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून ने आगाह किया कि ग़रीब देशों की अर्थव्यवस्थाएँ वही दबाव झेल रही है जिसका अमरीका और यूरोपीय देश सामना कर रहे हैं लेकिन इनमें से अनेक देशों के पास वो संसाधन नहीं हैं कि इस संकट का सामना कर पाएँ.
उन्होंने कहा, "इससे (वित्तीय संकट से) हमारी सारी उपलब्धियाँ और विकास नष्ट हो जाएगा. ग़रीबी दूर करने और बीमारियाँ ख़त्म करने की दिशा में की गई प्रगति, जलवायु परिवर्तन से जूझने के प्रयास और ये सुनिश्चित करना कि सभी लोगों को पर्याप्त खाना मिले, सभी को धक्का लगने का ख़तरा है."
'ग़रीबों पर गिरेगी गाज'
बान की-मून ने ज़ोर देकर कहा कि यदि विकासशील देशों को अतिरिक्त मदद नहीं मिलती तो हो सकता है कि दुनिया के ग़रीब लोग इस वित्तीय संकट का सामना न कर पाएँ.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने ये बात तब कही है जब विश्व के शेयर बाज़ार एक बार फिर गिरे हैं. न्ययॉर्क में वॉल स्ट्रीट में ख़ासी गिरावट आई है और इससे पहले यूरोप और एशियाई बाज़ारों में गिरावट आई.
पिछले कुछ हफ़्तों में विश्व के केंद्रीय बैंकों और सरकारों ने अरबों डॉलर बाज़ारों में लगाया है लेकिन बाज़ार वित्तीय से संकट के उबर नहीं पाए हैं.
उधर 1970 के दशक के बाद आइसलैंड पहला पश्चिमी देश है जिसने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आपात मदद के लिए अनुरोध किया है.
आइसलैंड की बैंकिंग प्रणाली के ध्वस्त हो जाने से वहाँ की अर्थव्यवस्था को पैदा हुए वित्तीय संकट के बाद आइसलैंड को इस संकट से उबारने के लिए आईएमएफ़ अगले दो साल में उसे दो अरब डॉलर का कर्ज़ देने पर सहमत हुआ है.