बुधवार, 10 सितंबर, 2008 को 10:07 GMT तक के समाचार
दुनिया में लघु उद्योगों के विकास के लिए माहौल बेहतर होता जा रहा है. इसका ख़ुलासा विश्व बैंक और निजी क्षेत्र के सहयोगी अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम की ओर से जारी 'डूइंग बिज़नेस - 2009' नाम की एक रिपोर्ट में किया गया है.
रिपोर्ट में दुनिया के 189 देशों के बारे में अध्ययन किया गया है और रिपोर्ट के अनुसार पिछले पाँच सालों में विशेषकर पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के देशों में नियामक सुधारों में तेज़ी आई है.
विश्व बैंक की इस सूची में दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं - भारत और चीन का स्थान काफ़ी नीचे है.
विकास का कारण
विश्व बैंक के निजी क्षेत्र विकास की उपाध्यक्ष पेनेपोल ब्रुक कहती हैं, "भारत और चीन जैसे देशों में विकास का कारण वहाँ चलाई जा रही बड़ी आर्थिक परियोजनाएँ और बढ़ता विदेशी पूँजी निवेश है."
वह कहती हैं कि इन देशों ने महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं, विशेषकर चीन ने. वहाँ उद्योगपतियों को अधिक क़ानूनी अधिकार दिए गए हैं और कर्ज़ देने की पात्रता निर्धारित करने की एक व्यवस्था विकसित की गई है.
रिपोर्ट के अनुसार 28 अफ्रीकी देशों ने भी आर्थिक सुधारों की गति तेज़ कर रहे हैं. इनमें लाइबेरिया और सिएरा लियोन जैसे देश भी शामिल हैं जहाँ सशस्त्र संघर्ष चलता रहा है.
'डूइंग बिज़नेस - 2009' की व्यापार करने वालें देशों की सूची के शिर्ष पर अभी भी विकसित देश बने हुए हैं. इस सूची में अमरीका तीसरे और ब्रिटेन छठे स्थान पर है.
पहले सोवियत संघ में शामिल रहे जार्जिया को इस सूची में पंद्रहवाँ स्थान दिया गया है. उसे दुनिया की कुछ प्रमुख व्यापार समर्थित शासन व्यवस्थाओं में से एक बताया गया है.
बाहरीन और मॉरेश्यस पच्चीस प्रमुख उदार देशों की सूची में शामिल हैं.
विश्व बैंक के निजी क्षेत्र विकास की उपाध्यक्ष पेनेपोल ब्रूक कहती हैं कि हमें इन नतीज़ों से बहुत अधिक नहीं चौंकना चाहिए.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंन कहा कि बहुत से छोटे विकासशील देशों ने यह महसूस किया कि उन्हें अपने घरेलू संसाधनों को एकत्र कर व्यापार समर्थक वातावरण तैयार करना चाहिए.
वे कहती हैं कि दुनियाभर में व्यापार की स्थितियाँ काफ़ी कठिन हैं और साथ ही भूमंडलीकरण से इन देशों को हो रहे फ़ायदे की बात भी करती हैं. वे कहती हैं कि इन देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था के आधुनीकिकरण और निवेश को आकर्षित करने के लिए प्रयास तेज़ किए हैं.
उन्होंने ये भी कहा है कि कई विकासशील देशों में उदार आर्थिक व्यवस्था तो है लेकिन वहाँ की राजनीतिक व्यवस्था उदार नहीं है.
इस संदर्भ में यह सवाल अभी भी उठ खड़ा हुआ है कि इन जगहों पर आर्थिक सुधार या तो राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा देंगे या राजनीतिक व्यवस्था आर्थिक सुधारों की रफ़्तार कम करेगी.