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गुरुवार, 19 जून, 2008 को 21:30 GMT तक के समाचार

आलोक कुमार
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

पेचीदा है महँगाई दर मापने का तरीका

आजकल भारत ही नहीं दुनिया के कई अन्य दशों में महँगाई तेज़ी से बढ़ रही है.

अनाज, तेल, स्टील समेत अन्य ज़रूरी सामानों के दाम बढ़ने से महँगाई की दर यानी मुद्रास्फ़ीति बढ़ी है.

भारत में मुद्रास्फ़ीति यानी महँगाई दर में इस वर्ष लगभग चार फ़ीसदी की वृद्धि हो चुकी है और यह लगातार बढ़ रही है.

दुनिया के अलग-अलग देश महँगाई दर मापने के लिए मुख्य तौर पर दो सूचकांकों का सहारा लेते हैं- थोक मूल्य सूचकांक और ख़ुदरा मूल्य सूचकांक.

भारत में थोक मूल्य सूचकांक को आधार मान कर महँगाई दर की गणना होती है. हालाँकि थोक मूल्य और ख़ुदरा मूल्य में काफी अंतर होने के कारण इस विधि को कुछ लोग सही नहीं मानते हैं.

महँगाई दर

गणित के हिसाब से थोक या ख़ुदरा मूल्य सूचकांक में निश्चित अंतराल पर होने वाले बदलाव को जब हम प्रतिशत के रूप में निकालते हैं, तो उसे ही महँगाई दर कहते हैं.

अगर भारत की बात करें तो यहाँ थोक मूल्य सूचकांक में 435 पदार्थों को शामिल किया गया है. इनमें खाद्यान्न, धातु, ईंधन, रसायन हर तरह के पदार्थ हैं और इनके चयन में कोशिश की जाती है कि ये अर्थव्यवस्था के हर पहलू का प्रतिनिधित्व करें.

थोक मूल्य सूचकांक का एक आधार वर्ष होता है. भारत में अभी 1993-94 के आधार वर्ष के मुताबिक थोक मूल्य सूचकांक की गणना हो रही है.

आधार वर्ष के लिए सभी 435 सामानों का सूचकांक 100 मान लिया जाता है.

मान लीजिए हमें वर्ष 2004 के लिए गेहूँ का थोक मूल्य सूचकांक निकालना है. अगर1994 में गेहूँ की क़ीमत आठ रूपए प्रति किलो थी और वर्ष 2004 में यह 10 रूपए प्रति किलो है तो क़ीमत में अंतर हुआ दो रूपए का.

अब यही अंतर अगर प्रतिशत में निकालें तो 25 फ़ीसदी बैठता है. आधार वर्ष (1994) के लिए सूचकांक 100 माना जाता है, इसलिए वर्ष 2004 में गेहूँ का थोक मूल्य सूचकांक होगा 100+25 यानी 125.

इसी तरह सभी 435 पदार्थों के अलग-अलग थोक मूल्य सूचकांक निकाल कर उन्हें जोड़ दिया जाता है. लेकिन ऐसा करते समय अगर ये लगता है कि अर्थव्यवस्था में किसी ख़ास सामान की उपयोगिता अधिक है तो सूचकांक में उसकी हिस्सेदारी की क़ीमत (भारांक) को कृत्रिम तौर पर बढ़ाया जा सकता है.

हर हफ़्ते होती है गणना

भारत में हर हफ़्ते थोक मूल्य सूचकांक का आकलन किया जाता है. इसलिए महँगाई दर का आकलन भी हफ़्ते के दौरान क़ीमतों में हुए परिवर्तन दिखाता है.

सामानों के थोक भाव लेने और सूचकांक तैयार करने में समय लगता है, इसलिए मुद्रास्फ़ीति की दर हमेशा दो हफ़्ते पहले की होती है.

अब मान लीजिए 13 जून को ख़त्म हुए हफ़्ते में थोक मूल्य सूचकांक 120 है और यह बढ़ कर बीस जून को 122 हो गई.

तो प्रतिशत में अंतर हुआ लगभग 1.6 फ़ीसदी और यही महंगाई दर मानी जाती है.

क्यों है विरोध

अमरीका, ब्रिटेन, जापान, फ़्रांस, कनाडा, सिंगापुर, चीन जैसे देशों में महँगाई की दर ख़ुदरा मूल्य सूचकांक के आधार पर तय की जाती है.

इस सूचकांक में आम उपभोक्ता जो सामान या सेवा ख़रीदते हैं उसकी क़ीमतें शामिल होती हैं.

इसलिए अर्थशास्त्रियों के एक तबके का कहना है कि भारत को भी इसी आधार पर महँगाई दर की गणना करनी चाहिए जो आम लोगों के लिहाज़ से ज़्यादा सटीक होगी.

भारत में ख़ुदरा मूल्य सूचकांक औद्योगिक कामगारों, शहरी मज़दूरों, कृषि मज़दूरों और ग्रामीण मज़दूरों के लिए अलग-अलग निकाली जाती है लेकिन ये आँकड़ा हमेशा लगभग एक साल पुराना होता है.