सोमवार, 28 अप्रैल, 2008 को 22:57 GMT तक के समाचार
लगातार बढ़ रही महँगाई के बीच भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) मंगलवार को अपनी मौद्रिक नीति की घोषणा करने जा रहा है.
आम आदमी, बैंकर और कॉरपोरेट जगत की निगाहें मंगलवार को घोषित होने वाली नई मौद्रिक नीति पर लगी हुईं हैं.
बढ़ती महंगाई, गिरते निर्यात और चढ़ते रुपए के बीच अहम सवाल ये है कि इस बार भारतीय रिज़र्व बैंक क्या करेगा.
आरबीआई ने अगर कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर), बैंक रेट, रीपो रेट या रिवर्स रीपो रेट में किसी प्रकार का बदलाव किया तो इसका ब्याज दरों पर असर पड़ सकता है.
इससे पहले इस साल जनवरी में मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा पेश करते वक्त आरबीआई के गवर्नर वाईवी रेड्डी ने साफ़ तौर पर कहा था कि महंगाई दर पर काबू पाना रिज़र्व बैंक की मुख्य चिंता है.
इधर मुद्रास्फीति की दर में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है.
इस वजह से रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति की समीक्षा को लेकर बहस और तेज़ हो गई है और सबकी निगाहें इसी ओर टिकी हैं कि आख़िरकार आरबीआई इस बार किस तरह के क़दम उठाने जा रहा है.
नीति का असर
आम तौर पर जब रिज़र्व बैंक कैश रिज़र्व रेशियो बढ़ाता है तो विभिन्न बैंक कर्ज़ की दरें बढ़ा देते हैं जिससे लोग कर्ज़ लेने से कतराते हैं.
विभिन्न वाणिज्यिक बैंक अपना पैसा रिज़र्व बैंक के ख़ज़ाने में जमा करते हैं. इस पर रिज़र्व बैंक जिस दर से ब्याज देता है उसे रेपो दर कहते हैं.
रिवर्स रेपो दर ठीक इसके उलट होती है. जब रिज़र्व बैंक अन्य बैंकों को कम अवधि के लिए उधार देता है तो उस पर जिस दर से ब्याज मिलता है उसे रिवर्स रेपो दर कहते हैं.
रेपो दर बढ़ने से खुदरा कारोबार करने वाले बैंक रिज़र्व बैंक में ही पैसा रखना फ़ायदेमंद समझते हैं क्योंकि उन्हें अधिक ब्याज मिलता है.
दूसरी ओर रिवर्स रेपो दर बढ़ने से बैंकों को रिज़र्व बैंक से उधार लेने पर अधिक ब्याज का भुगतान करना पड़ता है.
जब बैंकों को रिज़र्व बैंक से उधार लेने में अधिक ब्याज देना पड़ता है तो वो इसकी भरपाई खुदरा ग्राहकों को दिए जाने वाले कर्ज़ या रिटेल लोन पर ब्याज़ दर बढ़ा कर करते हैं.
इसलिए ऐसी परिस्थिति में घर या कार खरीदने के लिए कर्ज़ लेने पर उपभोक्ताओं को बढ़े हुए ब्याज दर पर भुगतान करना पड़ सकता है.