भारत में मुद्रास्फीति की दर पिछले तीन बरसों के अपने रिकॉर्ड ऊँचे स्तर पर पहुँचकर सात प्रतिशत हो गई है.
पिछले महीने वित्तीय वर्ष के समाप्त होने (22 मार्च) तक के आकलन के आधार पर पाया गया है कि महंगाई में बढ़ोत्तरी लगातार जारी है.
समाचार एजेंसियों के मुताबिक इससे पहले दिसंबर 2004 में मुद्रास्फीति की दर में रिकॉर्ड बढ़त देखी गई थी जब यह आंकड़ा बढ़कर 7.07 प्रतिशत तक पहुँच गया था.
इससे पहले 15 मार्च को समाप्त सप्ताह में मुद्रास्फीति की दर 6.68 रिकॉर्ड की गई थी जो पिछले 59 सप्ताह में सबसे ऊँची दर है.
कुछ महीने पहले तक यह दर चार फ़ीसदी के आसपास थी लेकिन तेज़ी से आई बढ़त के साथ अब यह दर सात प्रतिशत तक पहुँच गई है. पिछले साल इस दौरान मुद्रास्फीति की यह दर 6.56 रिकॉर्ड की गई थी.
महंगाई में लगातार हो रही इस बढ़त से केंद्र सरकार भी चिंता में है और स्थिति यह है कि यूपीए सरकार के मंत्री अब महंगाई के मुद्दे को गंभीरता से देखने के लिए विवश हैं. आगामी चुनावों को देखते हुए केंद्र के लिए महंगाई पर नियंत्रण करना बहुत ज़रूरी हो गया है.
जानकार बताते हैं कि छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशों और अगले वित्त वर्ष के लिए पेश बजट में सामाजिक क्षेत्र पर ख़र्च में वृद्धि के साथ ही कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमतों ने महँगाई के चढ़ने की आशंका बढ़ा दी है.
कमज़ोर प्रयास
हालांकि भारत में बढ़ती महँगाई पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने मार्च महीने के अंत में कई उपायों की घोषणा की थी.
सरकार ने ग़ैर बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है और कच्चे खाद्य तेलों पर आयात शुल्क बिल्कुल ख़त्म कर दिया गया है.
दलहन के निर्यात पर लगा प्रतिबंध भी एक साल के लिए और बढ़ा दिया गया है. रिफ़ाइंड तेलों पर आयात शुल्क घटा कर साढ़े सात फ़ीसदी किया गया है.
इसके अलावा बटर और घी पर आयात शुल्क 40 फ़ीसदी से घटाकर 30 फ़ीसदी किया गया है और मक्के के आयात शुल्क में भी कमी की गई है.
बावजूद इसके महंगाई में बढ़ता जारी है और जानकार बताते हैं कि सरकार के प्रयासों का असर तो पड़ेगा पर अगले कुछ सप्ताहों तक शायद महंगाई में कमी कर पाना संभव न हो.