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मंगलवार, 11 मार्च, 2008 को 08:23 GMT तक के समाचार

रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुँची तेल की क़ीमत

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. ये तेल की कीमतों में सबसे अधिक उछाल है और कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं..

ये पाँचवां मौक़ा है जब पिछले छह कारोबारी सत्रों में कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर पहुंची हैं.

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एक बैरल कच्चे तेल की कीमत 108.21 अमरीकी डॉलर पहुँच गई. हालांकि, बाद में कारोबार 107.93 डॉलर प्रति बैरल पर हुआ.

यूरोप में सोमवार को ब्रेंट कच्चे तेल के एक बैरल की कीमत 104.42 डॉलर दर्ज की गई.

'गिरता डॉलर है मुख्य कारण'

विश्लेषकों का मानना है कि अमरीकी डॉलर की लगातार गिर रही कीमत की वजह से निवेशक तेल की बजाए दूसरी सुरक्षित जगहों पर पैसा लगा रहे हैं.

यूरो और दूसरी मुद्राओं के मुक़ाबले डॉलर की कीमत लगातार गिरी है.

शुक्रवार को इसे एक बार फिर से झटका तब लगा जब अमरीकी श्रम बाज़ार पिछले पांच वर्षों की सबसे कमज़ोर स्थिति में जा पहुँचा.

इससे घबराकर कई निवेशक अब सोने और तेल जैसी चीजों में पैसा लगा रहे हैं ताकि अपनी पूँजी की क़ीमत को संभालकर रख सकें.

बताया जा रहा है कि तेल की क़ीमतों में बढ़त की एक वजह आपूर्ति में बढ़ोत्तरी न किया जाना हो सकता है.

ओपेक का फ़ैसला

पिछले सप्ताह ही तेल उत्पादक और निरायतक देशों के संगठन ओपेक ने तेल की आपूर्ति न बढ़ाने का निर्णय लिया है. यह फ़ैसला ऐसे वक्त में लिया गया है जब चीन की ओर से तेल की माँग बढ़ती जा रही है.

पर इसके पीछे दूसरे कारण भी हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ निवेशक अमरीकी डॉलरों में तेल खरीद रहे हैं. निवेशक ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि वो मुद्रा दरों में दर्ज हो रही गिरावट के दौर में अपने पैसे की कीमत को संभाल सकें.

इसी का असर तेल के दामों पर दिख रहा है.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के जानकारों के अनुसार 1980 में कच्चे तेल के एक बैरल की कीमत 102.42 डॉलर दर्ज हुई थी. लेकिन उनका कहना है कि आज के हालात की उस समय से तुलना करना बेमानी है.

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीज़ल और गैस जैसे उत्पादों की कीमत लगातार बढ़ रही है. इसका सीधा दबाव कारोबार और आम आदमी के घरेलू बजट पर पड़ रहा है.