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डॉ. आलोक पुराणिक
आर्थिक विशेषज्ञ

दुधारू गाय बनता सर्विस टैक्स

सरकार सर्विस टैक्स को दुधारु गाय मान कर चल रही है. बजट ने इस काम को आगे बढ़ाया है.

ये स्पष्ट है कि सेवा क्षेत्र के आगे कृषि और उद्योग पीछे छूट गए हैं.

बजट भाषण देते हुए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एक महत्वपूर्ण बात कही है "हम बजट के आंकड़ों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, उनके परिणामों पर नहीं". उनकी चिंता सही है, पर वोटों की चिंता सभी चिंताओँ पर भारी पड़ती है.

यही वज़ह है कि अभी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के असर पर बहस ही चल रही है कि इसका दायरा बढ़ा दिया है. देश के लगभग सभी ज़िलों को इसके दायरे में ला दिया गया है.

किसानों की कर्ज़ माफ़ी

वित्त मंत्री ने किसानों के कर्ज़ की समस्या का मसला जिस तरह से 60 हज़ार करोड़ रुपए की कर्ज़ माफ़ी के ज़रिए निपटाने की घोषणा की है, उससे लगता है कि वास्तविक समस्या को समझने की कोशिश की ही नहीं गई है.

सर्विस टैक्स को सरकार दुधारु गाय मान कर चल रही है. बजट ने इस काम को आगे ही बढ़ाया है.

सर्विस टैक्स मोबाइल के बिल से लेकर, ड्राइक्लीनिंग के खर्च तक, कोचिंग फ़ीस से लेकर स्टॉक बाज़ार सौदों तक सब जगह सर्विस टैक्स मौजूद है.

अपना मोबाइल बिल गौर से देखिए, बिल के नीचे के टोटल के आगे सर्विस टैक्स और एजुकेशन सेस लिखा होता है. यह कुल मिलाकर 12 फ़ीसदी से ऊपर पड़ता है.

सरकार की आस

सर्विस टैक्स से सरकार को बहुत उम्मीदें हैं. हर सरकार ने इसमें अपनी तरह से इजाफ़ा किया है.

एक जुलाई, 1994 को जब सर्विस टैक्स शुरू किया गया था, तब सिर्फ़ टेलीफोन, स्टॉक ब्रोकर सेवाएं, और जनरल इंश्योरेंस ही इसके दायरे में आती थीं. अब यह आंकड़ा शतक जमा चुका है.

1995-96 में इस मद में सरकार को कुल 862 करोड़ रुपए मिले थे. 2007-08 का लक्ष्य करीब 50,200 करोड़ रुपए का था.

जब पूरी अर्थव्यवस्था की विकास दर क़रीब नौ फ़ीसदी हो, तब सर्विस टैक्स में 30 फ़ीसदी से ज़्यादा की बढ़ोतरी बताती है कि सर्विस टैक्स किस हद दुधारु गाय बन चुकी है.

अभी अर्थव्यवस्था का करीब 55 फ़ीसदी सेवा क्षेत्र से आ रहा है. यानी उद्योग और कृषि जगत बहुत पीछे छूट गए हैं.

देश का सकल घरेलू उत्पाद करीब 42 लाख करोड़ रुपए है, इसका आधा हिस्सा भी अगर सेवा क्षेत्र का माना जाए, तो करीब 21 लाख करोड़ रुपए सेवा क्षेत्र के खाते में आते हैं. इसका 12 फ़ीसदी भी टैक्स माना जाए, तो करीब ढाई लाख करोड़ रुपए सर्विस क्षेत्र से वसूला जा सकता है.

2007-08 में इसकी सिर्फ 20 फ़ीसदी रकम सर्विस टैक्स से वसूले जाने का प्रस्ताव था. यानी सर्विस टैक्स में अब भी अपार संभावनाएं हैं.

यहीं से सर्विस टैक्स के पेंच शुरु होते हैं.

भेदभाव रहित

जिस तरह से आयकर विभाग संपन्न, ज़्यादा संपन्न, बहुत ज़्यादा संपन्न करदाता में अंतर करता है, वैसा अंतर सर्विस टैक्स नहीं करता. उत्पाद शुल्क, आयात शुल्क में वस्तु के आधार पर, उनके उपभोग के स्तर के आधार पर भेद किया जाता है.

यही वजह है कि विदेशी शराब पर इंपोर्ट ड्यूटी ज़्यादा होती है, देसी शराब पर टैक्स कम होता है. पर सर्विस टैक्स ऐसा कोई भेद नहीं करता.

यहां सारे करदाता एक ही उस्तरे से काटे जाते हैं. सर्विस टैक्स सिर्फ़ एक ही दर यानी क़रीब 12 फ़ीसदी की दर से काम करता है. जिसके मोबाइल का बिल एक हजार है, वो भी करीब 12 फ़ीसदी देगा, जिसके मोबाइल का बिल एक लाख है, वह भी 12 फ़ीसदी देगा. इस तरह से सर्विस टैक्स देने वाले की क्षमता के आधार पर कोई भेद नहीं करता.

इस तरह से सरकार के तमाम करों में यह मूलत: कर न्याय के सिद्धांत के विरोध में है.

सरकार से उम्मीद

एक वक्त था, जब सेवाओं का उपभोग आमतौर पर मध्यमवर्गीय या उच्च मध्यमवर्ग के उपभोक्ता करते थे. मोबाइल एक दौर में उच्च मध्यम से उच्च वर्ग तक के इस्तेमाल का आइटम था, पर अब ऐसा नहीं है.

इस देश में करीब 25 करोड़ मोबाइल उपभोक्ता हैं. ये सारे के सारे संपन्न नहीं हैं, पर कर ये सारे एक जैसा ही दे रहे हैं.

होना यह चाहिए कि सर्विस टैक्स देने वाली की क्षमता के हिसाब से लगे. यानी सुपर फाइव स्टार डीलक्स सूट का सर्विस टैक्स ज्यादा हो सकता है, छोटे बैंक्वेट हाल में शादी करने वाले पर कर का बोझ कम डाला जा सकता है. कार्पोरेट कोचिंग सेंटरों पर सर्विस टैक्स ज्यादा हो सकता है, लघु कोचिंग सेंटरों पर सर्विस टैक्स कम हो सकता है.

इस आधार पर सर्विस टैक्स लगे, तो कुछ राहत कम आय वालों, छोटे कारोबारियों को हो सकती है. देर-सबेर सरकार को इस दृष्टिकोण से विचार करना होगा. सर्विस टैक्स का दायरा अब इतना बड़ा हो गया है कि इन मुद्दों पर विचार किया जाना जरुरी है.