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मंगलवार, 26 फ़रवरी, 2008 को 11:40 GMT तक के समाचार

अशोक भटनागर
रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष

'रेल मंत्री का बजट पारंपरिक है'

मेरा मानना है कि ये रेल बजट पारंपरिक है और इसमें कोई नई बात नहीं है.

मीडिया में सबसे बड़ी बात जो सामने आ रही है, वो है किरायों में कमी की.

लेकिन पिछले साल भी किरायों में कमी की घोषणा की गई थी लेकिन उसके बाद उसे पूरा करने के लिए कई अधिभार लगा दिए गए थे.

यात्री सुविधाओं पर आप पाँच हज़ार करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं तो किरायों में 300 से 400 करोड़ का सब्सिडी कोई बड़ी बात नहीं है.

लेकिन उससे आपको वाहवाही बहुत मिलती है, फिर ये चुनावों का भी साल है.

लेकिन मेरा मानना है कि जितना खर्च आता है, उतना यात्री से किराया लिया जाना चाहिए, मुनाफ़े की बात मैं नहीं करता हूँ.

जहाँ तक रेलवे को लाभ की बात है तो अर्थव्यवस्था की 8-9 फ़ीसदी की रफ़्तार का लाभ उसे भी मिला है.

लेकिन अर्थव्यवस्था की रफ़्तार से आप कैसे गति बनाए रखेंगे, उस पर कोई स्पष्ट बात नहीं रखी गई है.

नई ट्रेनें

बजट में नई ट्रेनों की हमेशा से घोषणा की जाती रही है, उनके पीछे राजनीतिक कारण अधिक रहते हैं.

रेलगाड़ियाँ कहाँ रुकें उनके पीछे आर्थिक उद्देश्य कम और राजनीतिक उद्देश्य अधिक होते हैं.

लेकिन रेल मंत्री ने ये नहीं बताया कि राष्ट्रीय राजमार्गों में सुधार का रेलवे पर क्या असर पड़ रहा. मिसाल के तौर पर दिल्ली-जयपुर की ट्रेनें खाली जाने लगीं हैं.

साथ ही उन्होंने लोकल ट्रेनों के बारे में कोई बात नहीं की है, जबकि आम आदमी उससे सबसे अधिक प्रभावित होता है.

रेलवे लाइन के सुधार और ट्रेनों की गति बढ़ाने पर बात स्पष्ट की जाती तो बेहतर होता.

जहाँ तक सुरक्षा का प्रश्न है, उसमें तकनीक के अलावा मानवीय दक्षता की ज़रूरत रहती है. बेहतर प्रशिक्षण से ही उसमें सुधार लाया जा सकता है.

(आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित)