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शनिवार, 26 जनवरी, 2008 को 12:08 GMT तक के समाचार

अविनाश दत्त
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

शेयर बाज़ार में फिसलन के मायने

पिछले कुछ दिनों से समाचार माध्यमों में शेयर बाज़ार की ख़बर छाई है क्योंकि कई हफ़्तों तक आए उछाल के बाद शेयर बाज़ार अचानक धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरा. हालाँकि, इसके बाद बाज़ार में सुधार भी हुआ है.

दुनिया भर में शेयर बाज़ार जब तेज़ी से गिरना शुरू हुए तब ज़्यादा ख़बरें उन लोगों की छपीं जिनकी संपत्ति रातों-रात ढाई लाख करोड़ से घट कर दो लाख करोड़ हो गई.

लेकिन ये सब तो सिर्फ़ कागज़ों पर हुआ क्योंकि मुकेश अंबानी तो शेयर बेचने बाज़ार जा नहीं रहे थे.

असली धक्का तो छोटे निवेशकों को लगा जो थोड़े पैसे लगा कर कम दिनों में ज्यादा पैसा बनाने की सोच रहे थे.

मुंबई के प्रवीर सिन्हा जिन्होंने ढाई लाख रुपये शेयर बाज़ार में लगाये थे उन्हें काफी नुकसान हुआ. उनके साथी हर्षद का भी कुछ यही हाल है.

इन छोटे निवेशकों से सबको सहानुभूति है लेकिन एक आम आदमी को इस बात से ज़रा भी फ़र्क नहीं पड़ता कि मुकेश अंबानी को 50 हज़ार करोड़ का नुकसान हुआ.

शेयर बाज़ार का महत्व

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की डॉक्टर इला पटनायक कहती हैं, "अगर किसी कम्पनी के शेयर भाव नीचे जाते हैं तो इसका मतलब है कि उसके पास पूंजी कम हो रही है. ऐसे में वो आगे कम पैसा निवेश करेगी और अपने कर्मचारियों को कम तनख़्वाह देगी.

डॉक्टर पटनायक के अनुसार इस तरह मंदी का एक सिलसिला सा चल पड़ता है.

इसका मतलब ये हुआ कि अगर अंबानी की कंपनी के भाव गिरे तो उनकी पूंजी कम हुई.

मंदी का कारण ?

करीब साल भर पहले इसी समय अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बोले थे, "बेरोज़गारी कम हो रही है, आमदनी बढ़ रही हैं, अर्थव्यवस्था अच्छा काम कर रही है"

लेकिन हाल ही में डगमगाते बाज़ारों को दहशत भरी निगाहों से ताकते दुनिया भर के देशों के सामने बुश ने अमरीकी संसद में गुहार लगाई कि वो जल्द से जल्द एक आर्थिक पैकेज लागू करे ताकि मंदी से बचा जाए.

गिरते बाज़ार को संभालने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय सकल उत्पाद का एक प्रतिशत निवेश करने की बात कही.

दरअसल ये हालात ऐसे समय पैदा हुए जब सालों से अच्छा कर रही अर्थव्यवस्था को देखते हुए अमरीकी बैंकों ने ऐसे लोगों को भी मकान खरीदने के लिए कर्ज़ दे दिए जो कर्ज़ लौटा ही नहीं सकते थे.

जब ये बुलबुला फटा तब बैंकों को समझ आया कि उनके भंडार में उतना पैसा भी नहीं है जितना वो मान कर चल रहे थे.

घबराए बैंकों ने कर्ज़ देना बंद कर दिया, यहां तक की सहायक बैंकों तक को पैसा देने से इंकार कर दिया और बाज़ार में पैसे की कमी हो गई.

अमरीकी राष्ट्रपति ने जब राहत पैकेज की घोषणा की तब जा कर कहीं बाज़ार थोड़ा संभले.

पहले सँभलने वालों में भारत और एशिया के बाज़ार थे. फिर अमरीका और यूरोप के बाज़ार भी संभले.

खिसकता अर्थव्यवस्था का केंद्र

लगातार हर जगह बात हो रही है कि विश्व बाज़ार में अमरीकी रुतबा कम हो रहा है.

शेयर बाज़ारों के चाणक्य माने जाने वाले जॉर्ज सोरोस ने बीबीसी को एक इंटरव्यू में कहा, "ये समस्या उस युग का अंत है जब अमरीका के लोगों को अंतहीन कर्ज़ मिलता रहा. अमरीका जितना पैदा करता है उससे ज़्यादा खर्च करता है."

जॉर्ज सोरोस के अनुसार ये अब बंद हो जाएगा क्योंकि भारत, चीन, रूस और सउदी अरब जैसे देश जितना खर्च कर रहे है उससे ज़्यादा कमा रहे हैं."

क्या होगा अगर अमरीका की अर्थव्यवस्था चरमराई? यह पूछने पर सोरोस कहते हैं की वो दुनिया भर में मंदी की सूरत नहीं देखते बल्कि अर्थव्यवस्था का केन्द्र विकासशील देशों की तरफ़ खिसकता हुआ देखते हैं, ख़ास तौर पर चीन की तरफ़.

तस्वीर का दूसरा रुख़

कहावत है हाथी दुबला भी होगा तो भी गधों से मोटा ही रहेगा. तो क्या दुनिया अमरीका के बारे में बेफ़िक्र हो सकती है?

अमरीका आज भी दुनिया की करीब एक चौथाई अर्थव्यवस्था का मालिक है.

बम्बई शेयर बाज़ार से जुड़े चार्टपंडित डॉट कॉम के सीईओ हेमेन कपाड़िया मानते हैं कि सोरोस जिस भविष्य की बात कर रहे हैं वो शायद बहुत दूर की बात है.

हेमेन कहते हैं, "अमरीका आज भी एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, अगर वो ढीले भी पड़ेंगें और कम ख़र्च करेगें तो दुनिया भर में उनसे जुड़ी सारी अर्थव्यवस्थाओं में असर दिखेगा. जैसे लाखों युवाओं को रोज़गार देने वाले बीपीओ और कॉल सेंटर बंद हो सकते हैं."

लेकिन अमरीकी अर्थव्यवस्था लगातार कमज़ोर होती दिख रही है.

डॉलर का भाव तो लगातार कम हो रहा है. आने वाले वक्त में क्या होगा? किस तरफ़ जा रहा है भारत की अर्थव्यवस्था का भविष्य?

जाने माने अर्थशास्त्री भारत झुनझुनवाला कहते हैं. "एक बार तो अमरीका का असर होगा ही. पर डॉलर कमज़ोर होना बंद होगा ऐसा मुझे नहीं लगता. मेरा अपना व्यक्तिगत अनुमान है कि अगले दो साल में डॉलर 30 रुपए तक फिसल सकता है. और अगले दस साल में यह 15 या 20 रुपए भी पहुँच जाए तो कोई हैरानी नहीं होगी."

झुनझुनवाला मानते हैं कि तब तक भारतीय अर्थवय्वस्था इस झटके को झेल लेने के काबिल हो जाएगी क्योंकि मूलभूत ढांचे और रिसर्च में किए जा रहे निवेश परिणाम देने लगेंगे."

बहरहाल, अमरीका, चीन और भारत के भविष्य के बारे में तो समय तय करेगा.

एक आम निवेशक केवल अपने आप तय कर सकता हैं कि उसका क्या होगा. निवेशक को चाहिए कि वो अपना पैसा समझदारी से लगाए और केवल अख़बारों या टीवी चैनलों पर भरोसा न करे.