बुधवार, 02 जनवरी, 2008 को 21:10 GMT तक के समाचार
पहली बार तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुँच गई है.
विशेषज्ञों का मानना है कि नाइजीरिया, अल्जीरिया और पाकिस्तान में हिंसा, कमजोर डॉलर और कड़ाके की सर्दी की आशंका ने तेल की क़ीमतों को इस स्तर पर पहुँचा दिया है.
न्यूयॉर्क में कच्चे तेल की क़ीमतों में 4 डॉलर की बढ़ोत्तरी हुई और ये 100 डॉलर के स्तर पर पहुँच गया है.
इस बढ़ोत्तरी से महँगाई और बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है.
जबकि यूरोप और अमरीका के कई केंद्रीय बैंक विकास की दर को बढ़ाने और महँगाई को कम करने के लिए ब्याज दरों में कटौती करने जा रहे हैं.
अमरीकी शेयर बाज़ारों को इससे झटका लगा है.
विशेषज्ञ पीटर बुटेल का कहना है,'' जिन कारणों ने तेल की क़ीमतों को 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर किया था, वे उसे और ऊँचा कर रहे हैं.''
उनका कहना था,'' जब तक और आपूर्ति नहीं बढ़ती है या फिर माँग में कमी नहीं आती है, तब तक इसके कम होने की कोई वजह नज़र नहीं आती है.
'अधिक महत्व नहीं'
लेकिन कुछ विशेषज्ञ 100 की संख्या को बहुत अधिक महत्व न दिए जाने की सलाह देते हैं.
सिटीग्रुप के शोध विभाग के टिम इवांस का कहना है,'' ये कोई जादुई संख्या नहीं है. हमें ध्यान रखना चाहिए कि ये अचानक नहीं हुआ है.''
तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक ने इसके लिए तेल कारोबारियों को दोषी ठहराया है.
उसका कहना है कि तेल की माँग को पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में तेल उपलब्ध है.
दूसरी ओर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने तेल की क़ीमतों को कम करने के लिए अमरीकी रिज़र्व से तेल जारी करने से इनकार कर दिया है.
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि क़ीमतें और ऊपर जा सकती हैं.
अमरीका के विसडम फाइनेंशियल के ज़कारी ऑक्समैन का कहना है,'' 100 डॉलर का स्तर तो बस शुरुआत भर है. इस साल ये और ऊपर जा सकता है.''
ग़ौरतलब है कि जनवरी, 2007 में 50 डॉलर से भी नीचे रहीं तेल की क़ीमत साल के अंत तक लगभग दोगुनी हो गईं.