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गुरुवार, 07 जून, 2007 को 12:00 GMT तक के समाचार

राजेश रपरिया
वरिष्ठ पत्रकार

गठबंधन की मार से बैकफ़ुट पर सरकार

महंगाई ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को बैकफ़ुट पर ला दिया है और हाल के चुनाव नतीजों ने मनमोहन के आर्थिक दर्शन को हिलाकर रख दिया है.

मनमोहन सिंह को सत्ता में आए तीन साल हो गए हैं लेकिन महंगाई ने उनकी उपलब्धियों पर पानी फेर दिया है.

इस साल के बजट में गठबंधन के घटक दलों ने महंगाई को लेकर सरकार पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया.

नतीजतन आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को काबू करने के लिए केंद्र सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने सीमेंट कंपनियों पर कीमतें न बढ़ाने के लिए शिकंजा कसा. उदारीकरण के दौर में यह एक अभूतपूर्व घटना थी.

इससे सीमेंट कंपनियों और वित्त मंत्री के संबंधों में खटास तो आई ही, वित्तमंत्री को मुंह की भी खानी पड़ी.

मनमोहन सिहं के एक और मंत्री तो वित्तमंत्री से भी आगे निकल गए.

रामविलास पासवान ने इस्पात उत्पादों की कीमतें न बढ़ पाएँ, इसके लिए काफ़ी मशक्कत की.

यूँ तो पासवान अपने विनम्र और दोस्ताना व्यवहार के लिए लोकप्रिय हैं, पर इस मसले पर उन्होंने उद्यमियों की बाँह मरोड़ने में झिझक महसूस नहीं की.

पासवान ने चेतावनी दी है कि इस्पात कंपनियां या तो कीमत वृद्धि को स्थगित रखें या इस्पात उद्योग को मिल रही तमाम छूटों और राहतों को खोने को तैयार रहें.

राजनीतिक दांव

चुनाव के समय आर्थिक नीतियों और निर्णयों का बेशर्मी से राजनीतिक इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है.

त्रासदी यह है कि राजनेता आर्थिक नीतियों का बेहूदा इस्तेमाल कर खुद को चतुर राजनीतिज्ञ मानते हैं.

इतिहास का अकाट्य तथ्य है कि आर्थिक शक्ति के राजनीतिक इस्तेमाल से कभी किसी को स्थाई फायदा नहीं हुआ है.

देश की सबसे लोकप्रिय और सशक्त नेता इंदिरा गांधी ने आर्थिक नीतियों से राजनीतिक लाभ लेने की प्रथा को जन्म दिया, लेकिन इससे देश की तमाम व्यवस्थाएँ चरमरा गईं.

सब्सिडी और ग़रीबी उन्मूलन के नाम पर जो राजनीति उन्होंने की, वह उनके लिए अंततः गले की हड्डी बन गई.

तात्कालिक लाभ की राजनीति के मोहजाल से अब भी राजनेता निकल नहीं पाए हैं.

विद्युत क्षेत्र की खराब हालत इसका जीता जागता उदाहरण है.

इस क्षेत्र में सुधार न हो पाने के कारण अपेक्षित निवेश नहीं हो पा रहा है.

यह भी सच है जिस नेता ने इस मुद्दे को छुआ वह सत्ता से हाथ धो बैठा.

पेट्रोल की जलन

पिछले लोक सभा चुनावों के समय पेट्रोल व अन्य उत्पादों की कीमत वृद्धि का फ़ैसला महीनों टाला गया, जिसका ठीकरा सत्तारूढ़ होते ही मनमोहन सिंह के सिर फूटा.

तब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को लेकर यूपीए गठबंधन के घटकों, उसके सहयोगी वाम दलों और सरकार के बीच जो सर्कस हुआ, उसका सिलसिला अभी तक रुका नहीं है.

वामपंथी दलों के भारी दबाव का नतीजा ही है कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में सरकार अब तक वाजिब सुधार नहीं कर पाई है.

भविष्य निधि पर ब्याज दर का मसला हो या चीनी के निर्यात का. मसला गेंहू आयात का हो या फिर खाद्य तेलों के आयात शुल्क हटाने का, फिर चाहे मुद्दा गेहूं, धान, मोटा अनाज, तिलहन आदि के न्यूनतम समर्थन मूल्य का हो, हर मसले पर सरकार की फजीहत होती है.

उसकी स्थिति बंदर की सी हो गई है और गठबंधन सरकार के घटक और सहयोगी रूपी मदारी अपने इशारों पर उसे नचाते रहते हैं.

मजेदार बात यह है कि कभी-कभी कांग्रेस भी डमरू बजाने में पीछे नहीं रहती.

गठबंधन राजनीति की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि सब घटकों का वोट बैंक और उनके स्वार्थ भी अलग हैं.

खाद्यान्नों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में वृद्धि इसकी ताज़ा मिसाल मानी जा सकती है.

सरकार ने महंगाई के दंश को निर्मूल करने के लिए एड़ी से चोटी तक का दम लगा रखा है, लेकिन अर्थशास्त्र का सामान्य विद्यार्थी भी बता सकता है कि इससे खुले बाज़ार में महंगाई और बढ़ेगी.

यह गठबंधन राजनीति का ही नतीजा है कि मनमोहन सिंह सरकार को ख़ुद नहीं मालूम कि वह कहाँ खड़ी है और कहाँ जाना चाहती है.

(लेखक हिंदी के मिड डे अखबार डीएनए के सलाहकार हैं)