शुक्रवार, 09 फ़रवरी, 2007 को 14:08 GMT तक के समाचार
आलोक कुमार
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में विपक्षी दलों के साथ-साथ सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने तेज़ी से बढ़ रही महँगाई के लिए केंद्र सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया है.
उधर उद्योग संगठनों और कुछ आर्थिक जानकारों का कहना है कि महँगाई या मुद्रास्फ़ीति में बढ़ोत्तरी तीव्र आर्थिक विकास का नतीज़ा है और इससे ज़्यादा घबड़ाने की ज़रूरत नहीं है.
ग़ौरतलब है कि 27 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह में मुद्रास्फ़ीति की दर दो साल के सर्वोच्च स्तर 6.58 प्रतिशत पर पहुँच गई.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद इस पर चिंता जाहिर कर चुके हैं और रिजर्व बैंक खुले बाज़ार में नकदी घटाने के लिए लगातार छोटी अवधि के ब्याज़ दरों में वृद्धि कर रही है.
ख़तरनाक संकेत
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी बर्धन बढ़ती हुई महँगाई पर कहते हैं, “यह बहुत ख़तरनाक सेंकेत. ये बढ़ने के मूड में है और अभी इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो स्थिति बिगड़ सकती है.”
उनका कहना है कि लंबे अरसे से उनकी पार्टी सरकार को इस बाबात आगाह करती रही है लेकिन कोई ठोस क़दम नहीं उठाए गए.
बर्धन के मुताबिक महँगाई रोकने के लिए तुरत खाद्या पदार्थों में वायदा कारोबार पर रोक लगनी चाहिए. खुदरा बाज़ार में बड़े खिलाड़ियों के उतरने पर भी उन्होंने एतराज़ जताया.
उनका कहना है, ''अब बताइए. अग़र सारा अनाज और साग-सब्जी मुकेश अंबानी ख़रीद लेंगे तो क्या होगा?''
बर्धन ने कहा कि सरकार के साथ कई बैठकें होने के बावजूद कोई नतीज़ा नहीं निकल रहा है. उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, ''हम सौ बात कहते हैं तो वे एक बात नोट करते हैं. अब और बैठक क्या करना. सरकार अब भी नहीं चेती तो हम आंदोलन करेंगे.''
सरकारी निवेश बढ़े
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता निलोत्पल बसु बढ़ती महँगाई का कारण बताते हुए कहते हैं, ''सरकार ने खाद्यान्न जुटाने में निजी संस्थानों को बड़े पैमाने पर छूट दे रखी है. इसलिए उपज में ज़्यादा कमी न होने के बावजूद भी कीमतों पर नियंत्रण नहीं रह पाता.''
बसु कहते हैं, ''हमनें वामपंथी पार्टियों की ओर से प्रस्ताव दिया है जिसमें कृषि में लगातार सार्वजनिक निवेश कम होने की बात का ज़िक्र है. इसे बदलना होगा क्योंकि आखिरकार बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं बढाएँगे तो मुसीबत और बढ़ेगी.''
उधर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता विजय कुमार मल्होत्रा ने महँगाई के लिए सीधे तौर पर सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया.
वो कहते हैं, ''जैसे-जैसे सोनिया और सरकार इस पर चिंता व्यक्त करते हैं, महँगाई बढ़ती जाती है. सोनिया ने कितने पत्र लिखे और व्यक्तव्य दिए लेकिन कुछ नहीं हुआ. न कोई अकाल आया है न सुनामी. फिर ये महँगाई क्यों.''
मल्होत्रा का कहना है, ''भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई उस समय किसानों के बीच जाती है जब कोई ज़रूरत नहीं रहती. तब तक बिचौलिए अपना काम कर चुके होते हैं.''
निदान
आर्थिक मामलों के जानकार भरत झुनझुनवाला की राय में कृषि क्षेत्र को दरकिनार करने के कारण ऐसा हुआ है. वो कहते हैं कि उद्योग और सेवा क्षेत्र पर जोर देना ठीक है लेकिन किसानों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
उनका मानना है कि तेज़ी से हो रहे आर्थिक विकास के कारण भी थोड़ी बहुत महँगाई बढ़ती है क्योंकि लोगों के पास पैसा ज़्यादा होता है.
डॉ झुनझुवाला की सलाह में अनाजों के दाम बढ़ने पर उसके आयात की अनुमति देने की परंपरा घातक है.
वो कहते हैं, ''सरकार ने जो नीति बनाई है उसके तह जब भी दाम बढ़ता है, उसे आयात के लिए खोल देते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. आयात पर अंकुश लगाना ही फायदेमंद है. जैसे दाल का दाम अग़र बढेगा तभी किसान उत्पादन बढ़ाएगा. मेरा मानना है कि सरकार कृषि को भी मुक्त व्यापार के दायरे में लाना चाहती है. ये ठीक नहीं है.''
उद्योग और वाणिज्य संगठन फिक्की ने सरकार से उत्पादकता बढ़ाने और आपूर्ति में आ रही दिक्क़तों को दूर करने की माँग की है.
फिक्की का कहना है कि मँहगाई पर रोक लगाने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाना चाहिए.