मंगलवार, 19 दिसंबर, 2006 को 06:05 GMT तक के समाचार
राजीव खन्ना
बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद
विशेष आर्थिक जोन (एसईजेड) के क्षेत्र में गुजरात अग्रिम पंक्ति में खड़ा हुआ है. जहाँ अभी कई राज्यों में एसईजेड की स्थापना पर विचार ही चल रहा है, वहीं गुजरात में तीन एसईजेड काम कर रहे हैं और 33 की स्थापना की मँजूरी मिल चुकी है.
गुजरात में तमाम क्षेत्रों के एसईजेड बनाने की बात चल रही है.
प्रदेश में कांडला, सूरत और साचिन में जो तीन व्यापार मुक्त क्षेत्र (फ्री ट्रेड ज़ोन) बनाए गए थे उन्हें एसईजेड में परिवर्तित किया जा चुका है.
आने वाले समय में फार्मास्यूटिकल, गेम्स और ज्वेलरी, पेट्रो केमिकल्स और कुछ मल्टी प्रोडक्ट एसईजेड बनाने की योजना है.
राज्य सरकार भी निवेशकों को रिझाने के लिए एसईजेड नीति को और आकर्षक बना रही है.
जनवरी में होने वाले विब्रांत गुजरात सम्मेलन के दौरान प्रदेश की एसईजेड नीति को जोरदार ढंग से निवेशकों के सामने पेश किया जाएगा.
बढ़ते कदम
एसईजेड से एक कदम आगे बढ़ाते हुए ढोलेरा में निजी क्षेत्र में 'स्पेशल इकोनॉमिक रीजन' भी बनाया जा रहा है और कांडला में एक पूरे बंदरगाह को आधार बनाकर एसईजेड बनने जा रहा है.
व्यापार के लिए यूँ भी गुजरात को हमेशा से अनुकूल माना जाता रहा है.
प्रदेश में यातायात, बिजली और बंदरगाहों के भरपूर सुविधाएं उपलब्ध है जिसकी वजह से ये हमेशा से उद्योगपतियों का पसंदीदा राज्य रहा है.
जानकारों का कहना है कि गुजरात में काफी मात्रा में बंज़र ज़मीन उपलब्ध है जिस पर एसईजेड बनाए जा सकते हैं.
पानी की समस्या ज़रूर है पर उससे निपटने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी दोनों स्तरों पर काम जारी है.
आशंका
एक बात और कही जा रही है कि गुजरात में अधिक एसईजेड की स्थापना के बाद वहाँ पर लगने वाले उद्योगों में रोज़गार बहुत हद तक अन्य प्रदेश के लोगों को भी मिल पाएगा.
साथ ही एसईजेड में काम करने वाले मज़दूरों के अधिकारों को लेकर भी शंका जताई जा रही है.
लेकिन प्रदेश के उद्योग मंत्री अनिल भाई पटेल का कहना है कि गुजरात सरकार ने ऐसी रोज़गार नीति बनाई है जिसके तहत अगर किसी मज़दूर को नौकरी से हाथ धोना भी पड़ा तो उसे मिलने वाला मुआवज़ा साधारण तौर पर मिलने वाले मुआवजे़ से तीन गुणा अधिक होगा.
पटेल का कहना है कि कोशिश यह भी की जा रही है कि एसईजेड के ज़रिए सिर्फ़ रीयल एस्टेट का विकास न हो, बल्कि निर्यात को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ावा मिले.
अभी तक छिट पुट घटनाओं को छोड़ कर एसईजेड के मामले में सरकार को ज्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है.
गुजरात सरकार का कहना है कि निजी क्षेत्र की कंपनियों ने गुजरात में बन रहे एसईजेड की ओर सकारात्मक रुझान दिखाया है.
पोजितरा में प्रस्तावित एसईजेड एक मात्र ऐसा प्रोजेक्ट रहा है जो पर्यावरण और कुछ अन्य मुद्दों की वजह से विकसित नहीं हो पाया है.
सवाल
जाने माने सामाजिक विशेषज्ञ अच्युत याग्निक एसईजेड आधारित विकास के संदर्भ में कुछ सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि सबसे बड़ा सवाल मज़दूरों के अधिकारों का है.
इसके अलावा खेती योग्य ज़मीन को एसईजेड के विकास के लिए दिए जाने का मतलब होगा किसानों की परंपरागत सुरक्षा को खत्म करना और नई सुरक्षा तो उसे मिलने वाली है नहीं.
पर उद्योग विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि एसईजेड के लिए सरकार ज़मीन नहीं ले रही है.
यह काम वो निजी कंपनियाँ कर रही है जो एसईजेड विकसित करना चाहती है और अगर किसान अपनी ज़मीन देना चाहता है तो वो इन कंपनियों से मोल-भाव कर अपने हिसाब की कीमत ले सकता है.
फिलहाल तो गुजरात में एसईजेड क्षेत्र के विकास का भविष्य अच्छा नज़र आ रहा है पर देखना यह है कि निजी कंपनियों द्वारा विकसित किए जा रहे एसईजेड की प्रतिस्पर्धा में कौन कितने उद्योग ला पाता है.
इसके अलावा पानी की आपूर्ति और मज़दूरों की समस्याओं का समाधान किस तरह से हो पाता है इस पर भी नज़र रहेगी.