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सोमवार, 18 दिसंबर, 2006 को 08:27 GMT तक के समाचार

पीएम तिवारी
कोलकाता से

टाटा मोटर्स की परियोजना विवादों में

पश्चिम बंगाल में हुगली ज़िले के सिंगूर में टाटा मोटर्स की एक लाख रुपए की ड्रीम कार परियोजना को लेकर विवाद बढ़ गया है.

तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी परियोजना के लिए उपजाऊ ज़मीन के अधिग्रहण का विरोध कर रही हैं और आंदोलन कर रहे किसानों पर कई बार पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा है.

राज्य में हिंदुस्तान मोटर्स के बाद ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में यह दूसरा बड़ा निवेश है. राज्य सरकार इसके लिए 997 एकड़ जमीन टाटा समूह को सौंपेगी.

कंपनी ने कहा है कि निर्माण कार्य जल्दी ही शुरू होगा और वर्ष 2008 में छोटी कारों का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाएगा. इस परियोजना पर एक हज़ार करोड़ रुपए खर्च होंगे.

मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य कहते हैं, “इस परियोजना से सिर्फ सिंगूर या हुगली ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य का चेहरा बदल जाएगा. इस कारखाने पर आधारित सहायक उद्योगों की स्थापना से 10 हज़ार से भी ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलेगा.”

उपजाऊ ज़मीन

उनकी दलील है कि इस परियोजना के लिए जिस ज़मीन का अधिग्रहण किया गया है उसमें से 90 फ़ीसदी एक फ़सल वाली है. दूसरी ओर, ममता बनर्जी समेत विभिन्न संगठनों का दावा है कि यह ज़मीन काफी उपजाऊ है और वहाँ कई फसलें होती हैं.

बुद्धदेव ने इस मुद्दे पर विपक्ष को बातचीत का भी न्योता दिया है लेकिन तृणमूल कांग्रेस की दलील है कि पहले खेती की जमीन का अधिग्रहण रोक कर टाटा की परियोजना को सिंगूर के बजाय कहीं और स्थानांतरित किया जाए, उसके बाद ही कोई बातचीत संभव है.

राज्य सरकार और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा का कहना है कि लंबे अरसे बाद राज्य में ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में बड़ा निवेश हो रहा है. इसे रोकने या इसमें बाधा पहुँचाने का औद्योगिक हलकों में गलत संकेत जाएगा और इसके दूरगामी नतीज़े होंगे.

बुद्धदेव भट्टाचार्य के इस वर्ष मई में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद राज्य में विशेष आर्थिक ज़ोन यानी एसईजेड की स्थापना का काम भी तेज़ी पर है. पहले यहाँ एक ही एसईजेड था. अब कई और नए प्रस्तावों को हरी झंडी दिखा दी गई है लेकिन विपक्षी राजनीतिक दलों और कुछ अन्य संगठनों के आंदोलन के चलते इसकी राह काँटों भरी है.

राज्य सरकार का तर्क

सिंगूर में जारी विवाद के बावजूद सरकार देशी-विदेशी पूंजीनिवेश के मामले में अपने पाँव पीछे खींचने को तैयार नहीं है. उद्योग मंत्री निरुपम सेन कहते हैं, “अब हम राज्य के पिछड़े जिलों में छोटे एसईजेड की स्थापना को बढ़ावा देने पर विचार कर रहे हैं.”

वे कहते हैं कि राज्य में जल्दी ही तीन और एसईजेड स्थापित किए जाएँगे. इनमें से एक हल्दिया, एक नंदीग्राम (दोनों पूर्व मेदिनीपुर ज़िले में) और एक सिलीगुड़ी (दार्जीलिंग) में स्थापित किया जाएगा.

इसके अलावा हल्दिया में फर्मास्यूटिकल के लिए भी एक एसईजेड की स्थापना होगी. वीडियोकॉन समूह को तीन एसईजेड की स्थापना की मंजूरी मिल गई है.

हल्दिया और नंदीग्राम में बनने वाले एसईजेड में इंडोनेशिया के सलेम समूह की भागीदारी होगी. समूह के अध्यक्ष बेनी संतोषा हाल के अपने दौरे में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ इस मुद्दे पर विचार-विमर्श कर चुके हैं.

माकपा यहाँ एसईजेड की स्थापना की तेज़ गति से इतनी उत्साहित है कि उसने केंद्र सरकार को भी पश्चिम बंगाल मॉडल पर एसईजेड क़ानून में संशोधन की सलाह दे डाली है.

यहाँ 50 फ़ीसदी ज़मीन उद्योगों और 25 फ़ीसदी उनसे जुड़ी आधारभूत सुविधाओं के लिए संरक्षित है. बाकी 25 फ़ीसदी पर आवासीय निर्माण हो सकता है.

राजनीति

ज़मीन अधिग्रहण के मुद्दे पर माकपा को खुद वाममोर्चा के घटक दलों से विरोध झेलना पड़ रहा है.खासकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी भाकपा और फॉरवर्ड ब्लॉक ने किसानों के हितों की रक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही है.

इस मुद्दे पर आंदोलन करने वाली तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी कहती हैं, “सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को खुश करने के लिए किसानों के हितों की अनदेखी कर रही है.हम औद्योगिकीकरण के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन इसके लिए खेती की ज़मीन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.”

एक सप्ताह कोलकाता में रह कर इस मुद्दे पर अपना विरोध जताने वाली समाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने सिंगूर के आसपास के इलाकों के अलावा उस नंदीग्राम का भी दौरा किया जहाँ एसईजेड की स्थापना होनी है.

मेधा कहती हैं,“एसईजेड के नाम पर सरकार किसानों से उनकी उपजाऊ जमीन छीन रही है. यह आगे चल कर काफी घातक साबित होगा और राज्य को गंभीर खाद्य संकट से जूझना पड़ सकता है.”

वे कहती हैं, “सरकार के पास ज़मीन के इस्तेमाल की कोई ठोस नीति नहीं है. वह इन मामलों में पारदर्शिता भी नहीं बरत रही है.”

मेधा ने खेती की ज़मीन के अधिग्रहण के खिलाफ यहाँ भी ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की तर्ज पर आंदोलन करने की चेतावनी दी है.

इन आंदोलनों के बाद मुख्यमंत्री ने विपक्षी नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया है. वे कहते हैं, “विपक्ष के इस आंदोलन से पूरे देश में गलत संकेत जाएगा. विकास का रास्ता रोकने की बज़ाय विपक्ष को सरकार के साथ सहयोग करना चाहिए.”

मुख्यमंत्री का कहना है, “बीते विधानसभा चुनावों में आम लोगों ने औद्योगीकरण के पक्ष में राय दी थी. अब विकास की प्रक्रिया को धीमा करना उचित नहीं होगा. वे कहते हैं कि नए उद्योगों से रोज़गार के अवसर पैदा होंगे.”

औद्योगीकरण के समर्थन और विरोध में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं. सत्ता पक्ष व विपक्ष की इस रस्साकसी के चलते एसईजेड और दूसरे नए उद्योगों की राह आसान नज़र नहीं आती.