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सोमवार, 18 दिसंबर, 2006 को 14:35 GMT तक के समाचार

इस्लामी बैंकिंग का बढ़ता दायरा

दक्षिण लंदन में रहने वाली एमा डेलवे ने एक इस्लामी बैंक में अपना खाता खुलवाया है लेकिन उन्होंने ऐसा धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि 'नैतिक कारणों' से किया है.

एमा कहती हैं, "मेरे पास बहुत पैसा तो नहीं है लेकिन जितना है उसका इस्तेमाल मैं अनैतिक ढंग से नहीं होने देना चाहती, मैं नहीं चाहती कि मेरे जैसे ग्राहकों के खाते के पैसे से अफ्रीका में हथियार ख़रीदें जाएँ."

एमा की तरह सोचने वालों की तादाद बढ़ रही है जिनका मानना है कि अरबों-खरबों की जमा पूंजी वाले बड़े बैंक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने-अनजाने ऐसे बहुत सारे काम करते हैं तो अनैतिक होते हैं जिसमें वे भागीदार नहीं बनना चाहते.

इनमें से कई लोगों को लगता है कि इस्लामी बैंकों खाता खोलना एक बेहतर विकल्प है क्योंकि वे "पैसा कमाने से अधिक ध्यान अपने उसूलों पर देते हैं."

इस्लामिक बैंक ऑफ़ ब्रिटेन से मिल रही चुनौती को देखते हुए ब्रिटेन के प्रमुख बैंकों लॉयड्स-टीएसबी और एचएसबीसी ने भी शरिया अनुकूल खाते की व्यवस्था शुरू कर दी है.

लॉयड्स-टीएसबी के इस्लामी फाइनेंस विभाग के प्रमुख पॉल शेरेन कहते हैं, "इस्लामी खाते की व्यवस्था में हर वर्ग-समुदाय के लोग दिलचस्पी दिखा रहे हैं."

पॉल बताते हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, "मलेशिया में इस्लामी बैंकों के 25 प्रतिशत से अधिक खाताधारक ग़ैर-मुस्लिम हैं, ब्रिटेन में अभी यह छोटे पैमाने पर हो रहा है."

इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के मुताबिक़ सूद का लेन-देन हराम है, इसके अलावा इस्लामी बैंक इस बात की गारंटी दे रहे हैं कि वे तंबाकू, हथियार, शराब, कसीनो और पोर्नोग्राफ़ी जैसे कारोबार के लिए धन उपलब्ध नहीं कराएँगे.

एमा कहती हैं, "अगर शायद मेरे पास बहुत सारा पैसा होता तो मैं ब्याज की बात सोचती लेकिन जितना सूद मुझे मिल सकता है उसके लिए मैं नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं कर सकती."

सिर्फ़ दो वर्ष पहले डेढ़ करोड़ पाउंड से शुरू हुए इस्लामी बैंक ऑफ़ ब्रिटेन की आठ शाखाएँ इंग्लैंड में खुल चुकी हैं, लंदन के अलावा इस बैंक की शाखाएँ बर्मिंघम, लेस्टर और मैनचेस्टर में भी इस बैंक की शाखाएँ हैं.